कर्म छू नहीं सकता शब्द से भी पाएगा कौन, राम तक पहुँचेगा मन होकर मात्र मौन

भजना अपने आप में कोई कृत्य है ही नहीं| पढ़ना कृत्य है, पढ़ना निश्चित रूप से कृत्य है। भजना कृत्यों के पीछे का अकृत्य है।

बाहर-बाहर तमाम कर्म चलते रहते हैं, बाहर-बाहर कर्ता मौजूद रहता है और उनके पीछे जो अकर्ता बैठा हुआ है उसके मौन का नाम है भजना। उनके पीछे जो अकर्ता बैठा हुआ है उसके सूक्ष्म संगीत का नाम है भजना।

तो, भजने को हम कोई गतिविधि न समझें, न बना लें। पढ़ना गतिविधि है, पढ़ना जैसा हमने कहा “उपकरण मात्र है मन को भजने की दिशा में ले जाने के लिए।” पढ़ने से यदि भजना संभव हुआ तो पढ़ना सार्थक।

और यदि पढ़ना दिन की एक और गतिविधि ही बन के रह गया तो वो पढ़ना व्यर्थ ही गया।

आचार्य प्रशांत
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सत्र देखें: आचार्य प्रशांत: अभिनय का मतलब नकली होना नहीं है (Role-playing does not mean to be fake)

 
 

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संत के शब्द – एक आमन्त्रण

पूर्ण के किसी हिस्से में कोई अतिरिक्त पूर्णता तो नहीं होती। पूर्ण से पूर्ण निकलता है, तो भी पूर्ण ही शेष रहता है। क्या प्रतीक्षा करनी किसी नयी पत्ती की? क्या प्रतीक्षा करनी किसी भी फल की? असंख्य बार अनगिनत वृक्ष लगे हैं, और अनंत संख्या है पत्तों की, और फलों की जो लगे हैं, और गिरे हैं और ये चलता रहेगा। ये सब तो प्रकृति का बहाव है और प्रकृति मात्र देह है, ये सब तो देह का बहाव है आना-जाना, उठना-बैठना। मन ऐसा हो कि वो प्रतीक्षा में भी प्रतीक्षागत ना रहे, मन ऐसा हो कि जब वो पौधे को सींचे और कली की, फूल की, पत्ती की कामना भी करे, तब भी निष्काम रहे। मन ऐसा हो, जिसे साफ़-साफ़ पता हो कि आधीर होने से कुछ नहीं होगा, ऋतु आये ही फल होए। लेकिन साथ ही साथ, वो इस बोध में भी स्थित हो कि फल आएगा नहीं, फल है। कुछ भी नया जुड़ेगा नहीं क्यूंकि पूर्ण में कुछ नया जुड़ने का प्रश्न पैदा नहीं होता है। ना कुछ नया जुड़ेगा, ना कुछ पुराना कभी कहीं गया है। कभी कोई नया फल आने नहीं वाला, और पुराने जितने भी असंख्य फल आज तक लगे हैं, वो कहीं गए नहीं है।
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आत्मज्ञान की तीन विधियाँ

विचारों के बाद आप वृत्तियों तक पहुँच जाते हैं। क्योंकि जैसे-जैसे आप विचारों की गहराइयों में जाएँगे, तो अपको धीरे-धेरे वो गाँठ भी दिखने लग जाएगी, जहाँ से सारे गाँठ निकलते हैं। ”मैं ऐसा क्यों सोचता हूँ? अच्छा, सोच रहा हूँ, स्थूल विचार तो देख ही रहा हूँ, सूक्ष्म विचार भी दिखने लगे हैं।” फिर आप वहाँ तक भी पहुँचने लग जाते हैं, जो आपकी मूल ग्रंथियां होती हैं। उन ग्रंथियों के भी मूल में, जो गहरी से गहरी ग्रंथी बैठी है, ‘अहम् वृत्ति’, वहाँ तक पहुँच जाते हैं। और उसके बाद कुछ जानने को शेष नहीं रह जाता। उसके बाद जो है, उसे ज्ञान नहीं कहा जा सकता। जिसें विचारों को, वृत्तियों को और अंततः अहम् वृत्ति को देख लिया, जो इनका साक्षी बन गया, वो अब वहाँ पर पहुँच जाता है, जहाँ पर ज्ञान की सीमा आ जाती है। अब उसके आगे ज्ञान नहीं है, आप कह नहीं पाओगे, ”मैंने जाना क्योंकि जानने का काम ही वही अहम् वृत्ति करती है। अब साक्षी हो पाओगे, अब डूब पाओगे पर अब जानना ख़त्म हुआ।”
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तुम्हारा प्रतिरोध व्यर्थ है

थोड़ा तो गौर करो, कि तुम्हारी नियति क्या है। वही हो, वहीं से आए हो, वहीं को वापस जाना है। तो क्यों अपने ही रास्ते की बाधा बनते हो, क्यों जलने से इनकार करते हो? जिधर जाना है अंततः, उधर चले ही जाओ। जो तुम हो, उसी में वापस समा जाओ। नहीं। लेकिन, रूप ले लेने का, आकार ले लेने का, माया का खेल ही यही है कि एक बार रूप ले लिया, तो उसके बाद अरूप हो जाने में भय लगता है। भले ही सारे रूप अरूप से ही जन्मते हो लेकिन रूप को दुबारा अरूप हो जाने में बड़ा भय लगता है।
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बाहर काम अंदर आराम

अब मैं आपसे फिर कह रहा हूँ कि जिसने केंद्र में विश्राम को पा लिया, वो बाहर बड़े तूफ़ान खड़े करेगा और अगर आपकी जिंदगी में सिर्फ़ उदासी है और बोरियत है, गति नहीं है, त्वरा नहीं है, उर्जा नहीं है, बुझा-बुझा सा जीवन है, चार कदम चलने में आप थक जाते हैं, तो उसका कारण बस एक जानिए – आपके भीतर वो अस्पर्शित बिंदु नहीं है। जिसका केंद्र जितना अनछुआ रहेगा, वो परिधि पर उतना ही गतिमान रहेगा। आप अगर पाते हैं कि आपके जीवन में गति नहीं है, तो जान लीजिये कि गड़बड़ कहाँ हो रही है।

एक बुद्ध जब शांत हो जाता है, तो जीवन भर चलता है फिर, क्षण भर को बैठ नहीं जाता। समूचे उत्तर भारत पर छा गया था वो, तूफ़ान बन के। पुरानी रूढ़ियों को, सड़ी गली परम्पराओं को उठा फैंका था। यह तूफ़ान उस शांति से उपजा था, जो बुद्ध को उपलब्ध हुई थी।
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