अगर स्वेच्छा से कर रहे तो रुक कर दिखाओ || आचार्य प्रशांत (2019)

अगर ‘कर्ता’ नहीं हो, तो सदा नहीं हो। अगर ‘कर्ता’ हो, तो सदा हो।

फिर कड़वा फल आये, या मीठा फल आये, दोनों भुगतने के लिये तैयार रहो।

घपला नहीं चलेगा – कभी ‘हाँ’, कभी ‘न’।

वृत्तियों का दृष्टा बनें या दमन करें? || आचार्य प्रशांत (2019)

हम ‘करने’ को इतने उतावले रहते हैं, कि हम करे बिना जान ही नहीं पाते।

हमारे लिये ‘विशुद्ध बोध ‘जैसी कोई चीज़ होती नहीं है।

हमें तो कुछ खबर लगी नहीं, कि हमने क्रिया करी।

पता लगा नहीं, कि प्रतिक्रिया हुई।

साक्षित्व का वास्तविक अर्थ || आचार्य प्रशांत (2019)

साक्षित्व अपनेआप में कोई दशा नहीं होती।

साक्षित्व समस्त दशाओं की निस्सारता से परिचित होने का नाम है।  

साक्षित्व अगर अपनेआप में कोई दशा होती, तो फ़िर उस दशा का भी कोई और साक्षी होता न ।

साक्षित्व समस्त दशाओं से मुक्ति का नाम है।

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