कर्मफल मिलता नहीं, ग्रहण किया जाता है

फ़ल मिलने के लिए कोई होना चाहिए, जिसे फ़ल मिले| फ़ल मिला, किसको? जब शंकर कहते हैं कि बोध से तीनों प्रकार के कर्मों का विघलन हो जाता है| तो क्या कहते हैं? यही कहते हैं न कि जिसको सज़ा मिल सकती थी, वही नहीं रहा| जिसको फ़ल मिलता, वही नहीं रहा| आपने पूछा था न अभी कि लोग अपने कर्म फ़ल भुगत रहे हैं| कौन भुगत रहा है कर्म फ़ल? हमने क्या कहा था? वो जो उन कर्मों को अपना कर्म समझता है, उन कर्मों का फिर फ़ल भी भुगतेगा| जो उस कर्म के साथ बद्ध है ही नहीं, वो फिर उस फ़ल के साथ भी कहाँ से बद्ध हो जाएगा|
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आचार्य प्रशांत के साथ 26वां अद्वैत बोध शिविर आयोजित किया जा रहा है|

दिनांक: 26-29 नवम्बर
स्थान: शिवपुरी, ऋषिकेश, उत्तराखंड

आवेदन हेतु ई-मेल करें: requests@prashantadvait.com
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

https://prashantadvait.com/books-in-hindi/

उचित कर्म कौन सा है?

‘गुरु’, ‘करनी’, ‘चेला’। करनी के दो अलग-अलग स्रोत- गुरु और चेला, ठीक है। अब ‘कृष्णमूर्ति’ की भाषा में देखें तो जो करनी गुरु से आती है वो एक्शन कहलाती है और जो करनी चेले से आती है वो एक्टिविटी कहलाती है। कृष्ण की भाषा से देखें तो जो करनी गुरु से आती है वो कहलाती है -‘निष्काम कर्म’ और जो करनी चेले से आती है वो- ‘सकाम कर्म’ कहलाती है, बस यही है।
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25वां अद्वैत बोध शिविर आचार्य प्रशांत के साथ आयोजित किया जाने वाला है।
दिनांक: 16 से 19 अक्टूबर
स्थान: मुक्तेश्वर, उत्तराखंड

आवेदन हेतु requests@prashantadvait.com पर ई-मेल भेजें।
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कबीर के वचनों को समझने का प्रयत्न मानवता ने बारम्बार किया है। किन्तु संत को समझने के लिए कुछ संत जैसा होना प्रथम एवं एकमात्र अनिवार्यता है। संत जो कहते हैं उनके अर्थ दो तलों पे होते हैं – शाब्दिक एवं आत्मिक। समाज ने कबीर के वचनों के शाब्दिक अर्थ कर, सदा उन्हें अपने ही तल पर खींचने का प्रयास किया है, आत्मिक अर्थों तक पहुँच पाना उसके लिए दुर्गम प्रतीत होता है। आचार्य प्रशांत ने उन वचनों के आत्मिक अर्थों का रहस्योद्घाटन कर कुछ ऐसे मोती मानवता के समक्ष प्रस्तुत किये हैं जो जीवन की आधारशिला हैं। आज की परिस्थिति में जीवन को सरल एवं सहज भाव में व्यतीत कर पाने का साहस, आचार्य जी के शब्दों से मिलता है।

कबीर, जो सदा सत्य के लिए समर्पित रहे, उनके वचनों के गूढ़ एवं आत्मिक अर्थों से अनभिज्ञ रह जाना वास्तविक जीवन के मिठास से अपरिचित रह जाने के सामान है, कृपा को उपलब्ध न होने के सामान है।
प्रौद्योगिकी युग में थपेड़े खाते हुए मनुष्य के उलझे जीवन के लिए ये पुस्तक प्रकाश स्वरुप है।

गगन दमदमा बाजिया
http://tinyurl.com/AcharyaPrashant-Gagan

जिस दवा से मर्ज़ दूर हो रहा हो, उसे नमन करो और लेते रहो

उस मरीज़ की तरह मत रहो जिसे पता भी न चल रहा हो, कि दवाई काम कर रही है। एक व्यर्थ का खतरा आ सकता है—पता ही नहीं चला कि दवाई काम कर रही थी कि, दवाई में असावधानी कर बैठे। पता ही नहीं चला ये चीज़ इतना फायदा देना शुरू कर चुकी थी कि, इस चीज़ को हलके में ले बैठे। तुम्हें लाभ हो रहा है। उसके लक्षण, उसके प्रमाण सब उठ-उठ के सामने आ रहे है।

अब बस चलते रहो।

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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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मत बताओ कि क्या जानते हो, दिखाओ कि तुम हो क्या

पंडित के पास क्या है?
स – म – र – प – ण

भक्त के पास क्या है?
समर्पण

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कबीर के वचनों को समझने का प्रयत्न मानवता ने बारम्बार किया है। किन्तु संत को समझने के लिए कुछ संत जैसा होना प्रथम एवं एकमात्र अनिवार्यता है। संत जो कहते हैं उनके अर्थ दो तलों पे होते हैं – शाब्दिक एवं आत्मिक। समाज ने कबीर के वचनों के शाब्दिक अर्थ कर, सदा उन्हें अपने ही तल पर खींचने का प्रयास किया है, आत्मिक अर्थों तक पहुँच पाना उसके लिए दुर्गम प्रतीत होता है। आचार्य प्रशांत ने उन वचनों के आत्मिक अर्थों का रहस्योद्घाटन कर कुछ ऐसे मोती मानवता के समक्ष प्रस्तुत किये हैं जो जीवन की आधारशिला हैं। आज की परिस्थिति में जीवन को सरल एवं सहज भाव में व्यतीत कर पाने का साहस, आचार्य जी के शब्दों से मिलता है।

कबीर, जो सदा सत्य के लिए समर्पित रहे, उनके वचनों के गूढ़ एवं आत्मिक अर्थों से अनभिज्ञ रह जाना वास्तविक जीवन के मिठास से अपरिचित रह जाने के सामान है, कृपा को उपलब्ध न होने के सामान है।

प्रौद्योगिकी युग में थपेड़े खाते हुए मनुष्य के उलझे जीवन के लिए ये पुस्तक प्रकाश स्वरुप है।

गगन दमदमा बाजिया:
http://tinyurl.com/AcharyaPrashant-Gagan

स्वीकृति की चाह और नियन्त्रण का भाव

न आपके विचार आपके हैं, न आपके कर्म आपके हैं। दोनों ही तरह नहीं हैं आपके। जब अहंकार है तो आप मशीन बराबर हैं तो तब भी आपके नहीं और जब अहंकार नहीं है तो आप पूर्ण अस्तित्व हो गए तब भी आपके नहीं। आपका होना न होना, आपकी मर्ज़ी, आपकी मान्यता, इनकी क्या कीमत है?
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

https://prashantadvait.com/books-in-hindi/
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Birth of the Infinity.
The wild playfulness of the Essence.
The madness of Love.
Brimming with mischiefs. Still, unmovable at the centre.

Meet K R I S H N A
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Discourse by Acharya Prashant
Day and Date: Wednesday, 24th August 2016.
Venue: 3rd Floor G-39, Sec-63, Noida, U.P
Near Fortis Hospital
Time: 06:30 p.m.
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These invaluable sessions are free of cost For any assistance or query contact
Mr.Joydeep Bhattacharya: 9650433495

कर्ताभाव कौन त्यागेगा, कर्ता स्वयं ही मूल झूठ है

जब बोध के द्वारा काम हो रहा है तो करने वाले कृष्ण होंगे क्योंकि कृष्ण बोधस्वरूप हैं, और जब आदतों, संस्कारों और परिस्तिथियों के द्वारा काम हो रहा है तो करने वाली माया हुई; और माया भी कृष्ण की। तो दोनों ही स्तिथियों में कर्ता कौन हुआ?
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Birth of the Infinity.
The wild playfulness of the Essence.
The madness of Love.
Brimming with mischiefs. Still, unmovable at the centre.

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Day and Date: Wednesday, 24th August 2016.
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Near Fortis Hospital
Time: 06:30 p.m.
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