गुरु नहीं,गुरु की छवि आकर्षित करती है

जो जीने में मदद कर सके, वही सत्य है; बाकी सब मिथ्या है।

ओशो से ज़्यादा इस बात को कोई नही जानता था कि मोक्ष जैसी बेवकूफी की बात और हो नहीं सकती। लेकिन उन्हें भी ये दावा करना पड़ा कि मैं मुक्त-पुरुष हूँ। यही नहीं कि मैं मुक्त-पुरुष हूँ, उन्हें वो दिन भी बताना पड़ा कि इस दिन हुआ था और इस इस जगह हुआ था।

जो नहीं हैं, वो भी है, और उसको इज्ज़त देनी पड़ती है। जब इस बात को समझोगे न तो दुनिया में बहुत सारी बातें खुलेंगी, कि क्यों कुछ ऐसे-ऐसे हुआ। ऐसे-ऐसे क्यों कहा गया। किसी व्यक्ति ने ऐसे काम क्यों करे।

मन, मन से ही कटता है। मन का उपयोग करना नहीं जानते हैं आप तो बात बनेगी नहीं।

पूरा पूरा ही पूरा, अधूरा अधूरा और अधूरा

अभी तुमसे कह सकता हूँ कि ‘अधूरे हो’ क्योंकि तुमको एक माहौल बना के पूरेपन में स्थापित किया है।

अभी सुन लोगे मेरी बात।
अभी बहुत-बुरा नहीं लगेगा।

पर यही बात तुमसे बाज़ार में कोई बोल दे तो उसका गला पकड़ लोगे क्योंकि वहाँ पर अधूरेपन की बात ‘अधूरे’ से की जा रही होगी।

अभी अधूरेपन की बात कर सकता हूँ क्योंकि पूर्णता में स्थापित किया है तुम्हें और वही मेरी बात समझ भी पा रहे होंगे जो स्थापित हुए हैं। जो नहीं हो पाए, वो मेरी बात से बस द्वेष रख रहे होंगे; मन ही मन मुझसे लड़ रहे होंगे, मन ही मन विरोध कर रहे होंगे।

स्रोत की तरफ़ बढ़ो

सिर को झुकाकर बिल्कुल ऐसे हाथ खोल दो।
आँचल फैला दो, (हाथ खोलते हुए) ठीक ऐसे।
सिर को झुकाकर ग्रहण करो। और उसके बाद फिर कोई कंजूसी नहीं।
दिल खोलकर बाँटो, भले ही उसमें तुम्हें गालियाँ मिलती हों, भले उसमें कोई चोट देता हो –
यही मज़ा है जीने का। जीना इसी का नाम है।

मुफ़्त का लेते हैं, और मुफ़्त में बाँटते हैं – यही हमारा व्यापार है। यही धंधा है हमारा।
क्या धंधा है? मुफ़्त में लो! मुफ़्त में मिलता है।
‘वो’ तुमसे कोई कीमत माँगता ही नहीं।
एक बार तुमने सिर झुका दिया, उसके बाद ‘वो’ कोई क़ीमत नहीं माँगता।
कीमत यही है कि सिर झुकाना पडे़गा। इसके अलावा कोई कीमत माँगता ही नहीं, मुफ़्त में मिलेगा सब।

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