धोखा कैसे खा जाते हैं हम ?

सीख लेनी है तो अभी से लो। इस समय तुम मुक्त हो क्या कि तुम्हें कल की कहानी याद करनी है? कल से सीख लेने का आश्य क्या है?

और ये बात महत्वपूर्ण है क्योंकि सिखाया हमें यही जाता है कि पिछली गलतियों से सीखो। मैं कह रहा हूँ ठीक अभी जो गलती कर रहे हो, उसका सुधार कौन करेगा? अभी क्या तुम भूल मुक्त हो? ठीक अभी तुम गलती कर रहे हो और अगले क्षण एक नयी गलती होने जा रही है। तुम्हें ध्यान किस पर देना है? ठीक अभी तुम्हारे सामने गलती बैठी हुई है। तुम्हारे पास अवकाश कहाँ है कि तुम पुरानी गलतियों के बारे में सोचो? और जितना पुरानी गलतियों के बारे में सोचोगे, उतनी संभावना बढ़ेगी और गलतियाँ करने की।

बहुत बड़ी गलती है गलती के बारे में सोचना। जिसने गलती के बारे में सोचा, वो गलती पे गलती दोहराएगा।

~आचार्य प्रशांत
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संसार के बीचोंबीच संसार से मुक्त

आपके गले में खराश हो, आप किसी ऐसे को समझा के बता दीजिये, जिसके गले में कभी खराश ना हुई हो। आप जितने शब्दों का प्रयोग करना चाहें, आप पूरा ग्रन्थ लिख कर के उसे समझा दीजिये, तो भी आप नहीं समझा सकते। तो ये नापसंदगी की बात नहीं है कि, ‘’मुझे गले की खराश नापसंद है। ये बात ये है, कि मैं जानता ही नहीं। मेरे भीतर वो ताक़त ही नहीं है कि मैं गले की खराश की बात कर पाऊँ। इसलिए मैंने कहा था, स्वास्थ्य कुछ विशेष ताक़त नहीं है। स्वास्थ्य तो, निर्विशेष हो जाना है। बीमारी और ग़ुलामी में कुछ विशेष होता है। मुझे पता ही नहीं है, तुम क्या बातें कर रहे हो।
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इन्द्रियों के पीछे की इन्द्रिय है मन

दुनिया क्या है? कुछ है नहीं। जो आँखें दिखाती हैं, उसका नाम दुनिया है। ये न कहिये कि आँखे दुनिया को दिखाती हैं। सूक्ष्म अंतर है, समझियेगा।

आँखे दुनिया नहीं दिखाती। जो आँखे दिखाती है, वो दुनिया है।
आँखे दुनिया नहीं दिखाती। जो आँखे दिखाती है, वो दुनिया है। आँखे न रहें, तो दुनिया नहीं रहेगी। कईं बार यहाँ कह चुका हूँ कि दुनिया में कोई न रहे देखने वाला, तो सूरज नहीं उगेगा। ये बात प्रतिवाद लगती है, बहुत अजीब लगती है कि “ऐसा कैसे हो जाएगा? देखने वाला अगर नहीं रहेगा, तो सूरज नहीं उगेगा?” हाँ, भाई! नहीं उगेगा क्योंकि सूरज है ही नहीं। सूरज जैसी कोई चीज़ नहीं है।

सूरज क्या है? जो आँखें दिखाती हैं, वो सूरज है। सूरज का अपना कोई अनाश्रित अस्तित्व नहीं है। उसका कोई अपना ऑब्जेक्टिव फ्री, स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। पर ये बात बहुत भयानक लगती है।
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जीवन एक अनवरत प्रार्थना हो

जब आप कहते हैं अनेक इश्वर हैं, तो आप बिलकुल दूसरी बात कह रहे हैं। ‘अनेक हैं नहीं, अनेक है’। है एक, पर है अनेक। एक ही है, पर अनेक है और ये अनेक होना, उसकी एकता का हिस्सा है। इस्लाम में इसी बात को शिर्क बोला जाता है। टू बिलीव इन अ गॉड अदर देन अल्लाह और इस्लाम की सनातन धर्म से एक बहुत बड़ी शिकायत ही ये है कि तुम बहुत सारे ईश्वरों में यकीन करते हो, बहुत सारे कैसे हो सकते हैं? बहुत सारों में यकीन नहीं किया जा रहा है, एक में ही किया जा रहा है पर वो जो एक है, वो अनेक है।

वो कण-कण में है, वो हर जगह है, वो सब में है बहुत सारों में नहीं कोई ये कर रहा है एक ही है और जो कहता हो कि बहुत सारे हैं वो पगला है। अनेक नहीं हैं। अनेक है; एक है जो अनेक है।
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कार्य-कारण

एक तरीका ये है चलने का कि मैं तर्क देता रहूँगा, तर्क देता रहूँगा, तर्क देता रहूँगा, मैं सोंचता रहूँगा, सोचता रहूंगा, और सोच-सोच कर अन्ततः जो अचिन्त्य है, उसको भी पा लूँगा, ये सुनने में ठीक लगता है और ये आपको दरवाज़े तक ले जा सकता है, पर ये आपको दरवाज़े के बाहर नहीं ले जा पायेगा। ठीक है न। आप तर्क करते रहें, तर्क करते रहें, तर्क करते रहें, कारण पर चलते रहें, तो ये बात आपको कराणों के दरवाज़े तक तो ले जा सकती है, पर अकारण में प्रवेश नहीं करा पायेगी। दूसरी ओर अगर एक झटके में ही आप सीधे अकारणीय में स्थित हो जाएँ। तो ये जितने कारण हैं – कारण माने मन — मन का पूरा काम-धाम, मन की पूरी चाल अपनेआप स्पष्ट हो जाएगी। कहने का आशय ये है कि मन के ही भीतर रहकर के तो मन को भी नहीं समझा जा सकता। मन को भी अगर वास्तव में समझना है तो कहीं ऐसी जगह आसन लगाना होगा जो मन से बाहर है। किसी ऐसे की अनुकम्पा चाहिए होगी जो मन के बाहर है।

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