जहाँ दिखे वहाँ देखो, जहाँ न दिखे वहाँ भी देखो

जहाँ उसकी अनुपस्थिति दिखाई दे रही है, वहाँ वो अपनी अनुपस्थिति के माध्यम से उपस्थित हो गया। एक आदमी है जो सत्य में जी रहा है और एक आदमी है जो भ्रम में जी रहा है, तो ये मत कहियेगा कि जो भ्रम में जी रहा हैं, वहाँ सत्य नहीं है। क्योंकि वो भ्रम भी तो सत्य का ही है।

माया क्या अपने पाँव चलती है? माया को कौन चला रहा है?

अष्टावक्र यही कह रहें हैं:

‘नहीं है’ — ये कभी मत कहना;

‘है’, हाँ, होने के तरीके बदले हुए हैं,

दो अलग-अलग आयाम हैं।

‘है’ सदा वही।

अरे भाई ! तेरे फूलों से भी प्यार, तेरे काटों से भी प्यार। है तू ही, सत्य में भी तू है और भ्रम में भी तू है।

एक को जाने बिना लिया अनेकों का ज्ञान, यही मूल अज्ञान है यही दुःख की खान

कबीर समझाते-समझाते थके जा रहे हैं कि तुम्हें उसके जैसा होना है और तुम्हारी पूरी कोशिश क्या है? उसको अपने जैसा बना लेने की। अहंकार देख रहे हो? तुम कहते हो कि परम भी जैसा परम होगा तो होगा, पर हमसे तो नीचे ही है। तुम होगे बड़े ऊँचे, हमसे तो नीचे ही हो। हमारे सामने तो हमारे जैसे रहो। हमारी दुनिया में तुम हमारे जैसे रहो। जो तुमको खाना-पीना पसंद है वो तुम उनको भी खिला आते हो।
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‘आएँ और प्रकाश से अनुग्रहित हों’,

आचार्य प्रशांत द्वारा शब्द योग सत्र में।

दिन एवं दिनांक- रविवार, 30.10.2016
समय: प्रातः 9:00 बजे से
स्थान: तीसरी मंजिल, G-39, सेक्टर- 63 , नॉएडा
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कबीर के वचनों को समझने का प्रयत्न मानवता ने बारम्बार किया है। किन्तु संत को समझने के लिए कुछ संत जैसा होना प्रथम एवं एकमात्र अनिवार्यता है। संत जो कहते हैं उनके अर्थ दो तलों पे होते हैं – शाब्दिक एवं आत्मिक। समाज ने कबीर के वचनों के शाब्दिक अर्थ कर, सदा उन्हें अपने ही तल पर खींचने का प्रयास किया है, आत्मिक अर्थों तक पहुँच पाना उसके लिए दुर्गम प्रतीत होता है। आचार्य प्रशांत ने उन वचनों के आत्मिक अर्थों का रहस्योद्घाटन कर कुछ ऐसे मोती मानवता के समक्ष प्रस्तुत किये हैं जो जीवन की आधारशिला हैं। आज की परिस्थिति में जीवन को सरल एवं सहज भाव में व्यतीत कर पाने का साहस, आचार्य जी के शब्दों से मिलता है।

कबीर, जो सदा सत्य के लिए समर्पित रहे, उनके वचनों के गूढ़ एवं आत्मिक अर्थों से अनभिज्ञ रह जाना वास्तविक जीवन के मिठास से अपरिचित रह जाने के सामान है, कृपा को उपलब्ध न होने के सामान है।

प्रौद्योगिकी युग में थपेड़े खाते हुए मनुष्य के उलझे जीवन के लिए ये पुस्तक प्रकाश स्वरुप है।

http://tinyurl.com/AcharyaPrashant-Gagan

कुर्बानी माने क्या?

क़ुर्बानी, आहुति या त्याग, यह स्वतः स्फूर्त बोध और और प्रेम की बातें होती हैं, ये सामाजिक नहीं होती हैं। जब प्यार होता है, तब एक रोटी में आधी-आधी रोटी, बाँट ली जाती है, उसको त्याग नहीं बोला जाता। वो प्रेम है और उसी प्रेम का सहज फल है- ‘त्याग।’ उसको त्याग कहना ही नहीं चाहिए, त्याग कहना, ज़रा अपमान सा होगा, वो तो प्रेम है।
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आप सभी आमंत्रित हैं:
‘स्पिरिचुअल हीलिंग’ पर आचार्य प्रशांत द्वारा शब्द योग सत्र में।
दिनांक:26.10.2016
स्थान: तीसरी मंजिल, G-39,सेक्टर-63, नॉएडा
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

https://prashantadvait.com/books-in-hindi/

योग का क्या अर्थ है?

योग के लिए कुछ पाना नहीं है। जिस ‘एक’ पर आप बैठे थे उसके साथ-साथ ‘दूसरे’ को भी देख लेना है। योग का अर्थ समझिए, योग का अर्थ है- आप पुण्य पर बैठे हो, तो आप योगी नहीं हो सकते, क्यूँ? क्यूँकी पाप वहाँ दूर बैठा है और वो आपकी दुनिया से निष्कासित है। ठीक? आप योगी नहीं हो सकते। योगी होने का अर्थ है- मैं पुण्य पर बैठा हूँ और एक काबीलियत है मुझमें कि मैं पाप पर भी चला जाऊँ, बिलकुल करीब चला जाऊँ उसके, बिल्कुल, बिल्कुल करीब। इतना करीब कि पापी कहला ही जाऊँ और वहाँ जा करके साफ़-साफ़ मैं ये देख लूँ कि पाप का तत्व भी वही है जो पुण्य का तत्व है- ये योग है। रंग अलग-अलग है दोनों के पर तत्व एक हैं। यही योग है। अब दोनों एक हैं। समझ में आ रही है बात?
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25वां अद्वैत बोध शिविर आचार्य प्रशांत के साथ आयोजित किया जाने वाला है।

दिनांक: 16 से 19 अक्टूबर

स्थान: मुक्तेश्वर, उत्तराखंड

आवेदन हेतु requests@prashantadvait.com पर ई-मेल भेजें।
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मिल गया एक, और अब अनेकों से फुर्सत

जो लोग जितने ज़्यादा सामजिक हों वो खुद ही समझ जाएँ कि वो उतनी ही विरह में हैं। अभी दूल्हा मिल नहीं रहा इस कारण जीवन में इतना समाज भरा हुआ है। जीवन में अगर समाज की उपस्तिथि ज़बरदस्त है, पाँच-सात हज़ार लोगों का आपका दायरा है, दिन भर में पच्चीस-तीस आप फ़ोन कॉल करते हो, तो आप समझ लीजिये कि पिया नहीं मिला हुआ है। उसकी जगह खाली है और उसपर कोई इधर-उधर से आकर बैठ रहा है।
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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जो भीतर से एक है, उसे बाहर भी एक ही दिखाई देता है

मन को कुछ ऐसा मिल गया है जो बहुत पक्का है और मन लगातार उसके साथ बना हुआ है। अब बाहर कुछ भी चलता रहे पर भीतर उसका साथ छूटता नहीं। बाहर चीज़ें आती रही हैं जाती रहती हैं लेकिन भीतर कुछ ऐसा मिला हुआ है जिसका साथ छूटता नहीं। और जो भीतर की चीज़ है वो बहुत पक्की है। बहुत ज़्यादा विश्वसनीय है, वो कभी धोखा नहीं देती।

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