अपनी बात तो तब करें जब कोई दूसरा नज़र आये

विचार के तल होते हैं: निम्न्तम तल पर आप कहते हो, ‘मैं भाई हूँ, पिता हूँ, बन्धु हूँ, कर्ता हूँ’, उच्च्तम तल पर आप कहते हो, ‘मैं ब्रह्म हूँ, शून्य हूँ’। अष्टावक्र कह रहे हैं कि उच्चतम तल पर भी तुम्हारा ‘मैं’ भाव अभी बाकी रहता है। अष्टावक्र परम मुक्ति की बात कर रहे हैं, कहते हैं, कि मैं तो ये भी नहीं कह सकता कि ‘ब्रह्म हूँ’। जो उपनिषदों की परम घोषणा है, ‘अहम् ब्रह्मास्मि’, अष्टावक्र ने उसको भी मज़ाक बना दिया है।

ज्ञान न अज्ञान, न सुख न दुःख

मन दो स्थितियों में किसी भी वस्तु पर पूरा बैठता है:

१. पहली, जब वो उसे बड़ी प्रिय हो।

२. दूसरी, जब वो उसे बड़ी अप्रिय हो।

अभी यहाँ आपके सामने शेर आ जाये तो बड़ी गहरी एकाग्रता हो जाएगी। मन में कुछ और बचेगा नहीं उस शेर के अलावा। बाकी सारे विचार पीछे हो जाएंगे बस वो शेर बचेगा। तो एकाग्रता तो चित्त की वृत्ति ही है। एक तरफ़ को भागना – इसी का नाम एकाग्रता है।

‘उद्गार मौन के’ – इसका क्या अर्थ है?

शब्द वही सुनने लायक है, जो तुम्हें मौन में ले जाए।

व्यक्ति भी वही भला है, जिसकी संगति में तुम मौन हो सको। जान लो कि कौन तुम्हारा मित्र है, कौन नहीं। जिसकी संगति में तुम मौन हो सको, वो तुम्हारा दोस्त है। और जिसकी संगति में तुम अशांत हो जाओ, वो तुम्हारा दुश्मन है।

जो गीत सुनो और बिल्कुल स्थिर हो जाओ, वो गीत भला तुम्हारे लिये। और जो गीत सुनो और उत्तेजित हो जाओ, वो गीत ज़हर है तुम्हारें लिये।

परिपक्वता क्या है?

प्रश्न: सर, परिपक्वता क्या है? वक्ता: (१८-२२ वर्ष की आयु के विद्यार्थियों की सभा को संबोधित करते हुए) यह शब्द ‘परिपक्वता’ हम सभी को अपने लिए महत्वपूर्ण

अवलोकन और ध्यान में अंतर

हमारे जीवन में यदि उर्जा का अभाव है, यदि हम जो कुछ भी करते हैं उसमे संशय बना रहता है, तो स्पष्ट है कि जीवन में स्पष्टता नहीं है, निजता नहीं हैI कारण – जीवन में ‘अवलोकन’ नहीं हैI अवलोकन किसी भी चीज को स्पष्ट रूप से देखना है – बिना धारणाओं के हस्तक्षेप के – यानि ध्यान की पृष्ठभूमि में देखना है, और ये उर्जा का अनंत स्रोत हैI ये बिखरी हुई, अस्पष्ट, दिशाहीन उर्जा नहीं है, बल्कि केन्द्रित है, एक नुकीली तीर की तरह, जिसे स्पष्ट पता है कि उचित कर्म क्या हैI

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