क्या सत्य सबके लिए अलग-अलग होता है?

जो सत्य एक भी नहीं है, वो दो और पाँच, अट्ठारह कैसे हो सकता है? बड़ी तकलीफ होती है मन को, ‘ऐसी कौन-सी चीज़ है जिसके बारे में हम सोच ही नहीं सकते?’ चीज़ नहीं है दिक्कत यही है जिन्दगी में चीजें इतनी भरी हुई है, जिंदगी में विचार और वासनाएं इतने भरे हुए है, कि चीज के पार भी कुछ हो सकता है, यह ख्याल ही बड़ी तकलीफ दे जाता है, क्योंकि ”चीज़ के पार भी कुछ है तो हासिल तो हम कर नहीं पाएँगे|”
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न : http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट: https://goo.gl/fS0zHf

अलग अलग जन, एक ही मन

कोई दाएँ को भाग रहा है, कोई बाएँ को भाग रहा है, देखने में लग सकता है कि दोनों विपरीत काम कर रहे हैं, दिशाएँ विपरीत हैं। पर वो दोनों एक ही काम कर रहे हैं, क्या कर रहे हैं? भाग रहे हैं। तो इसी भागने का नाम मन है और यह लगातार भागता ही रहता है और किधर को भी भागे, इस अर्थ में कहा जाता है कि मन एक है। हाँ, ठहरना मन को नहीं भाता। जब ठहर गया तब कुछ ऐसा हुआ जो मन से थोड़ा हट कर के है। पर ठहरे हुए मन को फिर मन कहा ही क्यों जाएगा।
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प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन पच्चीस से ज्यादा अद्वैत बोध शिविरों का आयोजन करने के बाद, इस महीने की 24 तारीख को अपना 27वां बोध शिविर आयोजित करने जा रही है।

ईसा मसीह के जन्म दिवस को हर्ष एवं उल्लास के साथ मनाने का इस बोध शिविर से बेहतर मौका कहाँ हो सकता है!

विश्व भर के आध्यात्मिक ग्रंथों का अध्ययन करने, आचार्य प्रशांत जी के संग समय बिताने, और गंगा किनारे बैठ खुदमें डूब जाने का भी यह एक अनूठा अवसर है।

शिविर का हिस्सा बनने हेतु, requests@prashantadvait.com पर एक ईमेल करें ।
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अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें:
श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661
श्री कुंदन सिंह: +919999102998
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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मनुष्य वही जो मनुष्यता की सीमाओं के पार जाए

जब यह विचार ही आना बंद हो जाए कि कीमती है कि नहीं है, बस आपकी मौजूदगी है, आपका होना है, आपकी सत्ता का सहज प्रस्फुटन है, सहज सम्बन्ध है उस समय कौन मैं और कौन तू? याद किसको है? दूसरे शब्दों में ऐसे भी कह लीजिए तुम ‘तुम’ ना होते कोई और भी होते, तो भी जो अभी घटना घट रही है वो ऐसे ही रहती क्योंकि वो व्यक्ति सापेक्ष है ही नहीं, उसमें हम बदल क्या देंगे? वो वैसा ही रहता और फिर उसका यह भी अर्थ है कि अभी जो है वो बस तुम्हारे लिए ही नहीं हो सकता, वो समष्टि के लिए है।
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प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन पच्चीस से ज्यादा अद्वैत बोध शिविरों का आयोजन करने के बाद, इस महीने की 24 तारीख को अपना 27वां बोध शिविर आयोजित करने जा रही है।

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मनुष्य वृत्तियों की भूमि पर परिस्थितियों का फैलाव है

यह जो सारे सवाल उठते हैं न बार-बार कि मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है, इसके मूल में यह ही भ्रान्ति है कि यह विश्व ‘बनाया’ गया है। और वो समस्त धर्मों में है, क्योंकि जो शब्द कहे गए है ग्रंथों में उनसे आभास कुछ ऐसा ही होता है कि जैसे कहा जा रहा बनाया गया है, कि ब्रह्मा ने बैठ के बनाया या गॉड ने, अल्लाह ने बैठ के बनाया। जब भी आपको यह लगेगा कि बनाया गया है तो आपको यह भी लगेगा कि बनाने का कोई उद्देश्य होगा उसी को आप बोलते है, नीयति, भाग्य, किस्मत या जो भी, फिर आप यह भी कहते हो एक दिन ख़त्म हो जाएगा, क्योंकि जो कुछ भी बनता है उसका अंत भी आता है। फिर इसलिए आपको यह सब बातें करनी पड़ती है कि प्रभव है तो प्रलय भी होगा, आदि है तो अंत भी होगा, कि क़यामत का दिन आएगा, यह सारी भ्राँतियाँ इस बात से निकल रही हैं। आप समझ रहे हो? समय ख़ुद अपने आप में मानसिक है, न कोई बनाने वाला है, न कुछ बनाया गया है, यह जो सब है ये मात्र मानसिक है।
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वक्ता द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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तुम्हारे ही केंद्र का नाम है गुरु

गुरु का तुम्हारे सामने आना, तुम्हारा उसके प्रति आभार व्यक्त करना, ये सब यूँ ही है, माया, खेल, झूठ। तुम उसे जो समझ रहे हो वो वह है नहीं, तुम जिस बात पर आभार प्रकट कर रहे हो वो घटना कभी घट नहीं रही, वो तुम्हें किधर को ले जा रहा है वो तुम जानते नहीं, तो ये सब ऐसे ही है। हाँ, एक बात पक्की है, कुछ है जो तुम्हें खींच रहा है, वो पक्का है, तुम कुछ नहीं जानते, कुछ नहीं समझते, लेकिन कुछ है जो तुम्हें खींच रहा है, उसी का नाम गोबिंद है और वही तुम्हे गोबिंद की और ले जा रहा है। गुरु तो बीच का छलावा है, असली तो गोबिंद है, गुरु तो एक दिन धूएँ सा गायब हो जाएगा, पता भी नहीं चलेगा कहाँ गया, वो बचने नहीं वाला, रहने नहीं वाला, वो धोखा है, भ्रम है, मिट जाएगा एक दिन, उस दिन मात्र गोबिंद बचेगा, पर गुरु मिटेगा उस ही दिन जिस दिन तुम मिट चुके होंगे। तुम्हें मारे बिना नहीं मरेगा वो। बड़ा ज़िद्दी है।
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आचार्य प्रशांत के साथ 26वां अद्वैत बोध शिविर आयोजित किया जा रहा है।

दिनांक: 26-29 नवम्बर
स्थान:- शिवपुरी, ऋषिकेश, उत्तराखंड

आवेदन हेतु ई मेल भेजें requests@prashantadvait.com पर।
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कबीर के वचनों को समझने का प्रयत्न मानवता ने बारम्बार किया है। किन्तु संत को समझने के लिए कुछ संत जैसा होना प्रथम एवं एकमात्र अनिवार्यता है। संत जो कहते हैं उनके अर्थ दो तलों पे होते हैं – शाब्दिक एवं आत्मिक। समाज ने कबीर के वचनों के शाब्दिक अर्थ कर, सदा उन्हें अपने ही तल पर खींचने का प्रयास किया है, आत्मिक अर्थों तक पहुँच पाना उसके लिए दुर्गम प्रतीत होता है। आचार्य प्रशांत ने उन वचनों के आत्मिक अर्थों का रहस्योद्घाटन कर कुछ ऐसे मोती मानवता के समक्ष प्रस्तुत किये हैं जो जीवन की आधारशिला हैं। आज की परिस्थिति में जीवन को सरल एवं सहज भाव में व्यतीत कर पाने का साहस, आचार्य जी के शब्दों से मिलता है।

कबीर, जो सदा सत्य के लिए समर्पित रहे, उनके वचनों के गूढ़ एवं आत्मिक अर्थों से अनभिज्ञ रह जाना वास्तविक जीवन के मिठास से अपरिचित रह जाने के सामान है, कृपा को उपलब्ध न होने के सामान है।

प्रौद्योगिकी युग में थपेड़े खाते हुए मनुष्य के उलझे जीवन के लिए ये पुस्तक प्रकाश स्वरुप है।

http://tinyurl.com/AcharyaPrashant-Gagan

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