हम दूसरों से अलग अनूठे कैसे बनें?

तुम अपनी बात करने में बहुत घबराते हो, यहीं पर गलती हो रही है। तुम कह रहे हो, समय और ऊर्जा नष्ट हो रहे हैं, समय और ऊर्जा नहीं, पूरा जीवन नष्ट हो रहा है क्योंकि तुम ‘मैं’ बनने को तैयार नहीं हो। ‘मैं’ का अर्थ होता है, मेरी ज़िम्मेदारी, मेरी। अपने पाओं पर खड़ा हूँ, अपनी दृष्टि से देखता हूँ, अपनी समझ से समझता हूँ और फिर मेरा समय, मेरा है, अब समय नष्ट नहीं होगा, फिर मेरी ऊर्जा मेरी है। अब ऊर्जा भी नष्ट नहीं होगी।
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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अपनी बात तो तब करें जब कोई दूसरा नज़र आये

विचार के तल होते हैं: निम्न्तम तल पर आप कहते हो, ‘मैं भाई हूँ, पिता हूँ, बन्धु हूँ, कर्ता हूँ’, उच्च्तम तल पर आप कहते हो, ‘मैं ब्रह्म हूँ, शून्य हूँ’। अष्टावक्र कह रहे हैं कि उच्चतम तल पर भी तुम्हारा ‘मैं’ भाव अभी बाकी रहता है। अष्टावक्र परम मुक्ति की बात कर रहे हैं, कहते हैं, कि मैं तो ये भी नहीं कह सकता कि ‘ब्रह्म हूँ’। जो उपनिषदों की परम घोषणा है, ‘अहम् ब्रह्मास्मि’, अष्टावक्र ने उसको भी मज़ाक बना दिया है।

जहाँ दिखे वहाँ देखो, जहाँ न दिखे वहाँ भी देखो

जहाँ उसकी अनुपस्थिति दिखाई दे रही है, वहाँ वो अपनी अनुपस्थिति के माध्यम से उपस्थित हो गया। एक आदमी है जो सत्य में जी रहा है और एक आदमी है जो भ्रम में जी रहा है, तो ये मत कहियेगा कि जो भ्रम में जी रहा हैं, वहाँ सत्य नहीं है। क्योंकि वो भ्रम भी तो सत्य का ही है।

माया क्या अपने पाँव चलती है? माया को कौन चला रहा है?

अष्टावक्र यही कह रहें हैं:

‘नहीं है’ — ये कभी मत कहना;

‘है’, हाँ, होने के तरीके बदले हुए हैं,

दो अलग-अलग आयाम हैं।

‘है’ सदा वही।

अरे भाई ! तेरे फूलों से भी प्यार, तेरे काटों से भी प्यार। है तू ही, सत्य में भी तू है और भ्रम में भी तू है।

जो ही जगेगा, वो ही करुणा से भर जाएगा

जगा हुआ व्यक्ति पूरे संसार के लिए शुभ सन्देश होता है, सूरज की तरह होता है जो पूरी दुनिया का अँधेरा मिटाए| जगे हुए होने का अर्थ ही यही है कि, ”अब आत्म-केन्द्रित नहीं रहा, कि अब मेरा आत्म ब्रह्म हो चुका है|

दुखिया दास कबीर है, जागे और रोए

जो ही जगेगा, वो ही करुणा से भर जाएगा| जागृति कठोरता नहीं देती, जागृति करुणा देती है और यदि आप पाएं कि जागृति से संवेदनशीलता मर रही है, आप में करुणा का भाव नहीं उदित हो रहा, तो स्पष्ट समझ लीजिएगा कि आपकी जागृति सिर्फ़ आपके मन की एक कल्पना है, आप जगे नहीं हैं| जगा हुआ व्यक्ति पूरे संसार के लिए शुभ सन्देश होता है, सूरज की तरह होता है जो पूरी दुनिया का अँधेरा मिटाए| जगे हुए होने का अर्थ ही यही है कि, ”अब आत्म-केन्द्रित नहीं रहा, कि अब मेरा आत्म ब्रह्म हो चुका है| अब आत्म अहंकार के साथ संयुक्त नहीं रहा, अब आत्म वृहद हो चुका है, इतना फ़ैल चुका है कि उसमें सब समा गए हैं|अब मैं ये नहीं दावा कर सकता कि, ”किसी और का घर, अब मैं ये नहीं कह सकता कि, संसार का दुःख| मैं समष्टि के साथ एकाकार हूँ|’’
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प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन पच्चीस से ज्यादा अद्वैत बोध शिविरों का आयोजन करने के बाद, इस महीने की 26 तारीख को अपना 28वां बोध शिविर आयोजित करने जा रही है।

28वां अद्वैत बोध शिविर: एक पुकार परम की 💐
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में समय बिताने और विभिन्न स्रोतों से लिए गए श्रेष्ठतम कोटि के ग्रंथों को पढ़ने का एक अनूठा अवसर है २८वां अद्वैत बोध शिविर।

शिविर का हिस्सा बनने हेतु, requests@prashantadvait.com पर एक ईमेल करें ।
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अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें:
श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661
श्री कुंदन सिंह: +91-9999102998
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कबीर के वचनों को समझने का प्रयत्न मानवता ने बारम्बार किया है। किन्तु संत को समझने के लिए कुछ संत जैसा होना प्रथम एवं एकमात्र अनिवार्यता है। संत जो कहते हैं उनके अर्थ दो तलों पे होते हैं – शाब्दिक एवं आत्मिक। समाज ने कबीर के वचनों के शाब्दिक अर्थ कर, सदा उन्हें अपने ही तल पर खींचने का प्रयास किया है, आत्मिक अर्थों तक पहुँच पाना उसके लिए दुर्गम प्रतीत होता है। आचार्य प्रशांत ने उन वचनों के आत्मिक अर्थों का रहस्योद्घाटन कर कुछ ऐसे मोती मानवता के समक्ष प्रस्तुत किये हैं जो जीवन की आधारशिला हैं। आज की परिस्थिति में जीवन को सरल एवं सहज भाव में व्यतीत कर पाने का साहस, आचार्य जी के शब्दों से मिलता है।

कबीर, जो सदा सत्य के लिए समर्पित रहे, उनके वचनों के गूढ़ एवं आत्मिक अर्थों से अनभिज्ञ रह जाना वास्तविक जीवन के मिठास से अपरिचित रह जाने के सामान है, कृपा को उपलब्ध न होने के सामान है।

प्रौद्योगिकी युग में थपेड़े खाते हुए मनुष्य के उलझे जीवन के लिए ये पुस्तक प्रकाश स्वरुप है।
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सम्पूर्ण अकेलापन

आप जो कुछ भी कर रहे हैं, जैसे भी जी रहे हैं, उसमें क्या आपको कुछ भी ऐसा मिला है, जिस पर पराएपन की छाया न हो? या यह पूछ लीजिये अपनेआप से कि, “क्या मुझे संपूर्ण अकेलेपन का एक भी क्षण उपलब्ध होता है?” वही आपका अपना होता है। सुन्दर, पूर्ण अकेलापन। और वो अकेलापन जगत से भागने वाला नहीं होता है, वो अकेलापन आपकी अपनी पूर्णता का एहसास होता है। जहाँ भी दूसरा मौजूद है, वहीँ आपकी अपूर्णता मौजूद है। नहीं तो दूसरे के लिए जगह कैसे बनती।

और यदि मन और विचारों की भाषा में बात करनी हो, तो पूछ लीजिए अपने आप से कि, “क्या दिन भर में कोई भी क्षण ऐसा उपलब्ध होता है, जब मन पर विचार हावी न हों?” आप कहेंगे, “विचारों का आना-जाना तो चलता ही रहता है, प्रवाह है”। तो मैं कहूँगा, “ठीक, विचारों का आना-जाना तो चलता रहे, तो इतना ही बता दीजिए कि ज़रा भी अवकाश आपको ऐसा उपलब्ध होता है, जब आप विचारों से अनछुए रहें। ठीक, विचारों का आना-जाना चलता रहता है। क्या कभी ऐसा होता है कि आप विचारों से अनछुए रहें?”

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