गुरु और सद्गुरु में क्या अंतर है?

संसार का मतलब ही है कि वहाँ तुम्हें कोटियाँ मिलेंगी, वर्ग मिलेंगे, और विभाजन मिलेंगे।

परमात्मा के दरबार में न श्रेणियाँ हैं, न वर्ग हैं, न विभाजन हैं। वहाँ दो ही नहीं हैं, तो बहुत सारे कैसे होंगे?

दुनिया में बहुत सारी चीज़ें हैं। दुनिया में तुम कहोगे कि फलाने दफ़्तर में एक नीचे का कर्मचारी है, फ़िर उससे ऊपर का, फ़िर उससे ऊपर का, फ़िर उससे ऊपर का।

‘वहाँ’ ऊपर दो नहीं होते, ‘वहाँ’ एक है।

संत के शब्द – एक आमन्त्रण

पूर्ण के किसी हिस्से में कोई अतिरिक्त पूर्णता तो नहीं होती। पूर्ण से पूर्ण निकलता है, तो भी पूर्ण ही शेष रहता है। क्या प्रतीक्षा करनी किसी नयी पत्ती की? क्या प्रतीक्षा करनी किसी भी फल की? असंख्य बार अनगिनत वृक्ष लगे हैं, और अनंत संख्या है पत्तों की, और फलों की जो लगे हैं, और गिरे हैं और ये चलता रहेगा। ये सब तो प्रकृति का बहाव है और प्रकृति मात्र देह है, ये सब तो देह का बहाव है आना-जाना, उठना-बैठना। मन ऐसा हो कि वो प्रतीक्षा में भी प्रतीक्षागत ना रहे, मन ऐसा हो कि जब वो पौधे को सींचे और कली की, फूल की, पत्ती की कामना भी करे, तब भी निष्काम रहे। मन ऐसा हो, जिसे साफ़-साफ़ पता हो कि आधीर होने से कुछ नहीं होगा, ऋतु आये ही फल होए। लेकिन साथ ही साथ, वो इस बोध में भी स्थित हो कि फल आएगा नहीं, फल है। कुछ भी नया जुड़ेगा नहीं क्यूंकि पूर्ण में कुछ नया जुड़ने का प्रश्न पैदा नहीं होता है। ना कुछ नया जुड़ेगा, ना कुछ पुराना कभी कहीं गया है। कभी कोई नया फल आने नहीं वाला, और पुराने जितने भी असंख्य फल आज तक लगे हैं, वो कहीं गए नहीं है।
———————-
आचार्य प्रशांत से जुड़ने के माध्यम

1.) अद्वैत बोध शिविर
आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com par
या
संपर्क करें: श्री अंशु शर्मा: +91 – 8376055661

2.) आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स
आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर
या
संपर्क करें: श्री अपार मेहरोत्रा : +91 9818591240

3.) बोधसत्र का सीधा ऑनलाइन प्रसारण
आवेदन हेतु ई-मेल भेजें: requests@prashantadvait.com
या संपर्क करें:
श्रीमती अनुष्का जैन: +91 9818585917

4.) आचार्य जी से निजी साक्षात्कार
आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर
या
संपर्क करें: अनुष्का जैन: +91 9818585917
—————————–
आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट: https://goo.gl/fS0zHf

निष्ठा-किसके प्रति?

‘एक’ होना काफ़ी है; एक निष्ठ होना काफ़ी है। वो ‘एक’ कुछ भी हो सकता है, नाम से। वो नाम कुछ भी हो सकता है। इसीलिए, भारत में लाखों-करोड़ों इष्ट देवता रहे। क्या फ़र्क पड़ता है कि तुमने किसको अपना इष्ट बनाया? हाँ, इस बात से जरूर फ़र्क पड़ता है कि जिसको इष्ट बनाया, समर्पण पूरा रहे। मन उसके रंग में पूरा ही रंग जाए। फिर वहां पर दो फाड़ नहीं होना चाहिए, कि थोड़ा इधर और थोड़ा उधर। फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा सर किसके सामने झुका। पर जब झुके, तब पूरा ही झुक जाए। फिर उसमें आना-कानी नहीं होनी चाहिए। फिर उसमें कुछ बचा कर नहीं रखना। फ़र्क नहीं पड़ता कि तुमने किस नदी में विसर्जित किया। बात यह है कि पूरा विसर्जित होना चाहिए। फिर यह न हो कि तुमने चुपके से कुछ बचा कर रख लिया।
—————–
हिमालय की गोद में 30वें अद्वैत बोध शिविर का आयोजन किया जाने वाला है।
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में रहने का और दुनिया भर के दुर्लभ ग्रंथों के अध्ययन के इस सुनहरे अवसर को न गवाएं।

तिथि: 24-27 मार्च
स्थान: वी.एन.ए रिसोर्ट, ऋषिकेश

आवेदन भेजने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर
या
संपर्क करें:
श्री अंशु शर्मा: +91 – 8376055661
—————–
आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट: https://goo.gl/fS0zHf

न हुआ न हो रहा न होने के आसार,पर होता खूब प्रतीत होता ये संसार

जो स्रोत है, केंद्र है, वो बड़ा ही चंचल है। उसका स्वभाव आनंद का है। कोई वजह नहीं, कोई कारण नहीं, कोई जल्दी नहीं, कोई चिंता नहीं, और कोई कारण उस तक नहीं पहुँच सकता। एक तरह से तो स्रोत एक छोटे बच्चे की भाँति है, अपने में ही व्यस्त, चंचल, चिंतारहित और कुछ नहीं। स्रोत को एक छोटे, नंगे बच्चे की तरह भी अवधारित कर सकते हैं — अगर अवधारित ही करना है — जिसे कोई मतलब ही नहीं है, वो क्या कर रहा है? समझ लीजिए कि वो कहीं खड़ा है, कहीं पर रेत पर खड़ा है, किसी समुद्रतट पर खड़ा है। उसको फ़र्क ही नहीं पड़ रहा कि उसके दौड़ने से, रेत पर क्या निशान पड़ रहे हैं, और जो रेत पर निशान पड़ रहे हैं, उसको हम अपना जीवन कहते हैं।
—————–
हिमालय की गोद में 30वें बोध शिविर का आयोजन किया जाने वाला है।
आचार्य प्रशंत्ब के सानिध्य में रहने का और दुनिया भर के उर्लभ शास्त्रों के अध्ययन के इस सुनहरे अवसर को न गवाएं।

तिथि: 24-27 मार्च

आवेदन हेतु ईमेल भेजें:
requests@prashantadvait.com par
या
संपर्क करें:
श्री अंशु शर्मा: श्री अंशु शर्मा: +91 – 8376055661
—————–
आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट: https://goo.gl/fS0zHf

पूर्णता मुखर मौन है; तुम्हारी सारी कहानियाँ अपूर्णता की हैं

जब तक भविष्य रहेगा, तब तक हिंसा रहेगी औरआप तब तक अपने केंद्र से ही दुनिया को देखोगे। आप अपने केंद्र से ही अस्तित्व में जो कुछ है ,उसको देखोगे और उसका दोहन करना चाहोगे, शोषण करना चाहोगे। आप कहोगे, ‘’जो कुछ भी है, वो इसलिए है कि मेरे काम आ सके।’’ जंगल क्यों है? ‘’ताकि इसका पैदावार मुझे सुख दे सके।’’ जानवर क्यों हैं? ‘’ताकि मैं उन्हें खा सकूँ और उनसे श्रम ले सकूँ।’’ दूसरे क्यों हैं? ‘’ताकि मैं उनका किसी तरीके से इस्तेमाल कर सकूँ।’’ ये अहंकार का केंद्र रहेगा। आपको इस पर बैठना ही पड़ेगा। जब तक भविष्य है, तब तक अहंकार है। जब तक भविष्य है, तब तक हिंसा है।
————
29वां अद्वैत बोध शिविर
24 से 27 फरवरी, शिवपुरी, ऋषिकेश
आवेदन भेजने हेतु ई-मेल भेजें: requests@prashantadvait.com पर

अन्य जानकारी हेतु संपर्क करें:
श्री अंशु शर्मा: +91 8376055661
————
आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट: https://goo.gl/fS0zHf

1 2 3 12