मुरली बाज उठी अनघाता

कृष्ण की मुरली दूसरी है, वो दिल में बजती है| और अगर दिल में नहीं बज रही बाहर-बाहर ही सुनाई दे रही है तो आपने कुछ सुना नही| बुल्लेशाह की काफी हो, ऋभु के वचन हो, किसी संत, किसी ऋषि की वाणी हो, जब उसको सुनियेगा तो ऐसे ध्यान से सुनियेगा कि कान बेमानी हो जाएँ अनुपयोगी हो जाएँ| फिर आप कहें कि अब कानो पे ध्वनि पड़े न पड़े, शब्द भीतर गूंजने लगा है| शब्द तो माध्यम था, तरीका था, साधन था, आग अब लग गयी| हमारे भीतर लग गयी है| मुरली बज गयी, अब हमारे भीतर बज रही है, अब उसे नहीं रोका जा सकता |

आचार्य प्रशांत
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अद्वैत बोध शिविर

हर महीने होने वाले इन यह शिविर हिमालय की गोद में, आचार्य जी के नेतृत्व में रह कर दुनिया भर के दुर्लभ शास्त्रों के अध्ययन का अनूठा अवसर हैं।

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आध्यात्मिक ग्रंथों का शिक्षण (कोर्स)

आचार्य जी द्वारा हर माह चुनिंदा शास्त्रों पर प्रवचन एवं रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी में उनकी महत्ता जानने का अवसर।

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जागृति माह

जीवन के एक विशेष विषय पर और जीवन के आम दिनचर्या की समस्याओं का हल पाने का अनूठा अवसर। जो लोग व्यक्तिगत रूप से सत्र में मौजूद नहीं हो सकते, वो ऑनलाइन स्काइप या वेबिनार द्वारा बोध सत्र का हिस्सा बन सकते हैं।

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आचार्य जी से निजी साक्षात्कार

आचार्य जी से निजी बातचीत करने का बहुमूल्य अवसर।

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योग है अपनी बेड़ियों को अपनी ही ज्वाला में गलाना

हम में से अधिकांश जीवन को आदतों के पीछे से देखते हैं। हम जीवन से इतने एक हो चुके होते हैं, इतने अभ्यस्त हो चुके होते हैं कि जो भी चल रहा होता है, हमें सहज ही लगता है। कुछ भी हमें चौंकाता नहीं है। जो भी हमारे सामने आता है, हम कहते हैं, ऐसा ही तो होता है, यही तो जीवन है; दुनिया ऐसी ही तो है, संसार ऐसे ही तो चला है और चलेगा। हम में किसी प्रकार का विरोध उठना तो छोड़िये, सवाल भी नहीं उठता। बोध तो छोड़िये, जिज्ञासा भी नहीं उठती। हम बस स्वीकार किये जाते हैं और ये स्वीकार, अप्रतिरोध नहीं है। क्योंकि जो स्वतंत्र चैतन्य प्रतिरोध कर सके, वो हमारे पास होता ही नहीं है। जो मन, होनी पर सवाल उठा सके, वो मन हमने कहीं दबा दिया होता है। तो निष्पत्ति ये होती है कि खौफ़नाक से खौफ़नाक मंज़र भी हमें साधारण लगता है। और साधारण वैसे नहीं लगता जैसा किसी ज्ञानी को लगे, साधारण ऐसे लगता है कि, खौफ़ तो जीने का तरीका है ही ना। इसी को तो जीवन बोलते हैं, तो अचम्भा कैसा?
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मुझे क्या पाने की ज़रूरत है?

‘जिनको कुछ ना चाहिए’ का मतलब ये नहीं है की इच्छाएं कहीं मर गई। उनका मतलब ही यही है कि इच्छाएं आती-जाती रहेंगी। सारी इच्छाएं जिसको पाने के लिए है, हम उसको जान गए हैं। आपकी कोई भी इच्छा है — आपने कहा ना ख़ुशी के लिए है — हम उस ख़ुशी को जान गए हैं।
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भक्ति योग एवं पुरुषोत्तम योग आचार्य प्रशांत के साथ
6 मार्च से आरम्भ
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स्वयं का विसर्जन ही महादान है

दान वो नहीं जिसमें तुमने कुछ ऐसा छोड़ा, जो तुम्हारे पास है। दान की महत्ता इसलिए है, क्योंकि दान में तुम स्वयं को ही छोड़ देते हो और जिसको तुमने अपना आपा, अपना ‘मैं’, अपना स्वयं घोषित कर रखा है, वही तुम्हारा कष्ट है, वही तुम्हारा अहंकार है। वही तुम्हारे पाओं की बेड़ियाँ और अहंकार का बोझ है। जब तुम दान करते हो, तब तुम किसी और पर एहसान नहीं करते। जब तुम दान करते हो, तो अपने आप पर एहसान करते हो क्योंकि जो तुम दान कर रहे हो, वो वास्तव में तुम्हारी बीमारी है।
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आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में 29 वें अद्वैत बोध शिविर का आयोजन किया जा रहा है।
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में रहने का और दुनिया भर के दुर्लभ शास्त्रों को पढने का अद्भुत मौका व्यर्थ न जाने दें।

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प्राण क्या हैं?

वो जादू जो मिट्टी में प्रेम उतार देता है, उसे ‘प्राण’ कहते हैं।
इसीलिए उपनिषद् कहते हैं, “प्राण ही ब्रह्म है।”

‘वो’ कुछ ऐसा कर देता है जो हो नहीं सकता था।
राख हो जाना है आपको, और राख से ही आए हो आप।
पर इस राख की उड़ान देखो, इस राख की समझ देखो, इस राख की गहराई देखो – ये ‘प्राण’ कहलाती है, ये ‘प्राण’ है।

जीवन तभी है जब उसमें प्राण हों।
और ‘प्राण’ का मतलब साँस मत समझ लीजिएगा कि साँस चल रही है, तो मैं प्राणी हुआ।
आप प्राणवान केवल तब हैं जब आपके जीवन में ‘वो’ मौजूद है, जो आपके जीवन को जीने के क़ाबिल बनाता है,
अन्यथा आप अपने आपको मुर्दा और निष्प्राण ही मानें।

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