आशा और ममता: नास्तिकता की निशानी

आशा नास्तिकों का काम है, वैसे ममता भी किसी नास्तिक का ही काम होगा।

जिसमें श्रद्धा है, जो परम से संसर्ग में है, उसमें ममता हो ही नहीं सकती। आशा देखती है भविष्य की ओर और ममता देखती है, दूसरों की ओर। दोनों में से कोई भी नहीं है, जो अपनी ओर देखता हो, जो परम की ओर देखता हो, जो सत्य की ओर देखता हो। आशा ने और ममता ने दोनों ने ही बड़े सस्ते विकल्प ख़ोज लिए हैं। दोनों ने ही दो बड़े सस्ते झूठ ख़ोज लिए हैं।

आशा कर्म कराएगी भविष्य के लिए और ममता कर्म कराएगी दूसरे के लिए और जब तक ममता की वस्तु मौजूद रहेगी तब तक सारे कर्म बस उसके लिए होंगे, और गहरे कर्म में लिप्त होना ही पड़ेगा।

आशा-बेचैनी का झूठा इलाज

आशा नास्तिकों का काम है, वैसे ममता भी किसी नास्तिक का ही काम होगा। जिसमें श्रद्धा है, जो परम से संसर्ग में है, उसमें ममता हो ही नहीं सकती। आशा देखती है भविष्य की ओर और ममता देखती है, दूसरों की ओर। दोनों में से कोई भी नहीं है, जो अपनी ओर देखता हो, जो परम की ओर देखता हो, जो सत्य की ओर देखता हो। आशा ने और ममता ने दोनों ने ही बड़े सस्ते विकल्प ख़ोज लिए हैं। दोनों ने ही दो बड़े सस्ते झूठ ख़ोज लिए हैं। आशा कर्म कराएगी भविष्य के लिए और ममता कर्म कराएगी दूसरे के लिए और जब तक ममता की वस्तु मौजूद रहेगी तब तक सारे कर्म बस उसके लिए होंगे, और गहरे कर्म में लिप्त होना ही पड़ेगा।
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प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन पच्चीस से ज्यादा अद्वैत बोध शिविरों का आयोजन करने के बाद, इस महीने की 26 तारीख को अपना 28वां बोध शिविर आयोजित करने जा रही है।

28वां अद्वैत बोध शिविर: एक पुकार परम की 💐
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में समय बिताने और विभिन्न स्रोतों से लिए गए श्रेष्ठतम कोटि के ग्रंथों को पढ़ने का एक अनूठा अवसर है २८वां अद्वैत बोध शिविर।

शिविर का हिस्सा बनने हेतु, requests@prashantadvait.com पर एक ईमेल करें ।
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अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें:
श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661
श्री कुंदन सिंह: +91-9999102998

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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न : http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट: https://goo.gl/fS0zHf

सम्पन्नता ये नहीं कि तुम्हारे पास क्या है, सम्पन्नता है कि तुम क्या हो

आपको अपने सभी संबंधों को बड़ी स्पष्टता से देखना होगा। जब भी किसी को देखना, चाहे वो बॉस हो, चाहे वो दोस्त हो और चाहे वो कोर्टशिप का केस हो, प्रेमी हो या प्रेमिका, उसको ऐसे मत देखना कि उसके पास क्या है, ये देखना कि वो क्या है। ये मत देखना कि व्हाट डज़ ही हैव, देखना कि व्हाट ही ऑर शी ईज़। हमारी आँखें धोखा खा जाती हैं। हमारा ध्यान ‘हैव ’ खींच ले जाता है कि इसके पास क्या है। हम ये नहीं देख पाते कि ये क्या है। अंतर समझ में आ रहा है?
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प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन पच्चीस से ज्यादा अद्वैत बोध शिविरों का आयोजन करने के बाद, इस महीने की 26 तारीख को अपना 28वां बोध शिविर आयोजित करने जा रही है।

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आचार्य प्रशांत के सानिध्य में समय बिताने और विभिन्न स्रोतों से लिए गए श्रेष्ठतम कोटि के ग्रंथों को पढ़ने का एक अनूठा अवसर है २८वां अद्वैत बोध शिविर।

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प्रेम उम्मीद नहीं रखता

मैं दो बातें कह रहा हूँ- तुम उम्मीद करोगी नहीं अगर अभी जो हो रहा है उसमें तुम्हें बहुत मज़ा आ रहा है। अभी जो चल रहा है, अगर ये बिल्कुल मस्त चीज़ है तो आगे की उम्मीद करनी किसे है? तो उम्मीद का जन्म भी मायूसी से होता है और उम्मीद का अंत भी मायूसी में होता है क्योंकि आज तक किसी की उम्मीदें पूरी हुई नहीं। तुम अपवाद नहीं हो सकतीं। आज तक किसी की उम्मीदें पूरी नहीं हुई हैं।
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ज़िम्मेदारी माने क्या?

किसी के प्रति क्या ज़िम्मेदारी है यह जानने के लिए पहले तुम्हें उसको जानना पड़ेगा और उससे अपने सम्बन्ध को जानना पड़ेगा और मूल में खुद को जानना पड़ेगा। जब तुम न उसको जानते, न रिश्ते को जानते, न खुद को जानते तो तुम ज़िम्मेदारी को कैसे जान जाओगे?
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हारना बुरा क्यों लगता है?

जो परिणामो पर निर्भर है, वो तो हार-जीत के बीच में झूलता रहेगा; वो जीत कर भी नहीं जीतेगा, वो सदा हारा ही हुआ है क्योंकि उसकी जीत कभी आखरी नहीं होगी। कभी तुमने किसी को आखरी जीत तक पहुँचते देखा है? जो हारे हैं वो तो हारे ही हैं; जो जीते भी हैं वो और भी बड़े हारे हैं क्यूँकी उनको अभी भी डर लगा हुआ है कि जीत छिन न जाए; क्यूँकी उनको अभी भी अपेक्षा है कि इससे बड़ी कोई जीत संभव है।
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25वां अद्वैत बोध शिविर आचार्य प्रशांत के साथ आयोजित किया जाने वाला है।

दिनांक: 16 से 19 अक्टूबर

स्थान: मुक्तेश्वर, उत्तराखंड

आवेदन हेतु requests@prashantadvait.com पर ई-मेल भेजें।
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