आँखों का महत्व

जिसने खुद को जाना, जिसकी आँखें अंदर को मुड़ गई, जानने लग गया हो कि यह सब भागना-पहुंचना ये सब क्या है; अब उसकी आँखें क्यों बाहर भटकें? क्या बाहर तलाशें? जिसे अपने घर में ही जन्नत मिल गई हो, वो खिड़की से बार-बार बाहर झाँक के देखेगा क्या? करोगे ऐसा? तो ऑंखें अपनेआप बंद हो जाती है। बुद्ध की आँखें देखी हैं? ध्यान भर में ही नहीं मुंदी रहती है, उनकी आँखें अध्मुंदी होती हैं, तब भी, जब वो लोगों के साथ हो, अध्मुंदी आँखें बड़ा सुंदर प्रतीक है। ऐसा नहीं कि बाहर देख ना रहे हो, पर आँखें भीतर को भी मुड़ी है; दोनों प्रक्रिया एक साथ चल रही है। जगत में कर्ता, भोक्ता भी है, साथ ही में साक्षी भी है; दोनों एक साथ चलते है तो आँखें भी आधी खुली रहती है। दुनिया के खेल है, तो भागीदार हैं।
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हिमालय की गोद में 30वें अद्वैत बोध शिविर का आयोजन किया जाने वाला है।
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में रहने का और दुनिया भर के दुर्लभ ग्रंथों के अध्ययन के इस सुनहरे अवसर को न गवाएं।

तिथि: 24-27 मार्च
स्थान: वी.एन.ए रिसोर्ट, ऋषिकेश

आवेदन भेजने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर
या
संपर्क करें:
श्री अंशु शर्मा: +91 – 8376055661
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
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तुम्हारी बेवफ़ाई ही तुम्हारी समस्या है

तुम ये देखो कि तुम्हें कष्ट क्यूँ होता है समझना इस बात को। जैसे तुम कष्ट के चक्कर में फँसे हो न ठीक उसी तरह से दुसरे लोग भी फँसे हैं। जब तुम ये समझ जाओगे कि तुम कैसे फँसे तो तुम दूसरों के चक्कर भी समझ जाओगे। जब तुम ये समझ जाते हो कि कोई कैसे फँसा तो तुम्हें कष्ट से मुक्ति का रास्ता भी मिल जाता है। फिलहाल तो तुम असंभव की बात कर रहे हो। तुम कह रहे हो कि जैसे लोग हैं, जैसे ढर्रों पे वो चल रहे हैं, वो ढर्रे चलते रहे उन ढर्रों से कोई मुक्ति ना मिले लेकिन कष्ट भी साफ़ हो जाए। ऐसा हो नहीं सकता न।

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हिमालय की गोद में 30वें अद्वैत बोध शिविर का आयोजन किया जाने वाला है।
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अभिभावकों से स्वस्थ सम्बन्ध

प्रेम ये नहीं होता कि तुम अपनी मानसिकता कि कोठरी में कैद हो और हम उसी में कैद रहने देंगे। प्रेम कहता है कि भले हमारे-तुम्हारे संबंधों में तनाव आ जाए लेकिन मैं तुम्हें भी मुक्त करके रहूँगा क्योंकि मैंने मुक्ति जानी है और मुक्ति बड़ी आनंदपूर्ण है। तो भले तुम्हें बुरा लगे, फिर भी मैं तुम्हारी साहयता करूँगा। एक-दुसरे को बंधन में डालने का नाम थोड़े ही प्रेम है।

~ आचार्य प्रशांत
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शरीर को महत्त्व देना ही है उम्र का सम्मान

जितना तुम्हारा देह भाव गहरा रहेगा, उतना ज़्यादा तुम उम्र को इज्ज़त दोगे| सवाल ये नहीं है कि तुम्हारे भीतर ये संस्कार कहाँ से आ

शराबखाने में और वक़्त बिताने से होश में नहीं आ जाओगे

जितना तुम्हारा देह भाव गहरा रहेगा, उतना ज़्यादा तुम उम्र को इज्ज़त दोगे| सवाल ये नहीं है कि तुम्हारे भीतर ये संस्कार कहाँ से आ गया कि कोई बूढ़ा होते ही इज्ज़त का पात्र हो जाता है; सवाल ये है कि तुम अपनी देह को किस रूप में देखते हो? क्योंकि जो किसी दूसरे को इस कारण इज्ज़त देगा कि उसके बाल पक गए हैं, वो स्वयं भी यही अपेक्षा रखेगा कि, ‘’मुझे भी मेरी उम्र के अनुसार अब आदर मिले|’’

तुम्हारे मन से ये भावना हट जाए — दूसरे को छोड़ो — तुम्हारे मन से अपने लिए ये भावना हट जाए कि, “मैं शरीर हूँ, और मुझे मेरी उम्र के अनुसार व्यवहार मिलना चाहिए,” तो फिर तुम पूरे संसार को उसकी उम्र की मुताबिक नहीं देखोगे| तुम अपने आप को उम्र के मुताबिक़ देखते हो ना, इसीलिए पूरी दुनिया को उम्र के मुताबिक देखते हो| तुम कहते हो, “अभी तो मैं जवान हूँ, अभी तो मेरी ये उम्र है, वो उम्र है|” जब तुम अपने आप को कहते हो कि, ‘’मैं जवान हूँ. और जवान होने से ये निर्णय होता है कि मुझे क्या करना चाहिए,’’ तो तुम दूसरे को भी कहते हो कि, “अब ये जवान नहीं है और इसकी प्रौढ़ता से निर्णय होगा कि ये क्या करे?”
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29वां अद्वैत बोध शिविर
24 से 27 फरवरी, शिवपुरी, ऋषिकेश
आवेदन भेजने हेतु ई-मेल भेजें: requests@prashantadvait.com पर

अन्य जानकारी हेतु संपर्क करें:
श्री अंशु शर्मा: +91 8376055661
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अभी और कितना सहारा चाहिए तुम्हें?

जिस स्मृति से धोखा खाते हो, वो स्मृति भी किसने दी है? जिस माया के कारण ‘उसको’ भूलते हो, वो माया भी उसी की है। तो अब और क्या माँग रहे हो?

‘वो’ अपने होने पर भी है और अपने न होने पर भी है। तो अब और क्या माँग रहे हो? जब सत्य है, तब तो सत्य है ही, जब सत्य नहीं है, तो माया है। और माया क्या है? माया भी तो सत्य का ही रूप है। छाया है सत्य की। ‘वो’ अपने होने में भी है, ‘वो’ अपने न होने में भी है; अब प्रार्थना क्या कर रहे हो, माँग किस चीज़ की है? या तो मिलेगा या तो नहीं मिलेगा। मिला तो मिला, नहीं मिला तो भी मिला। जीते तो जीते, हारे तो भी जीते। कृष्ण कहते हैं अर्जुन से कि, “या तो मुझे पाएगा, नहीं तो मेरी माया में फंस जाएगा। दोनों ही स्थितियों में हूँ तो मैं ही।”
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29वां अद्वैत बोध शिविर
24 से 27 फरवरी, शिवपुरी, ऋषिकेश
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