व्यक्ति-सापेक्ष प्रेम, एक झूठ

जो आप अपनेआप को समझते हो — ये अहंकार की बड़ी मस्त चाल होती है — अहंकार उससे नीचे भी नहीं चाहता कि आप जाओ और ये भी नहीं चाहता कि आप उससे ऊपर जाओ। समझ रहे हो? वो और घना होना चाहता है उसी क्षेत्र में, जहाँ पर वो पहले से है। आप अपनेआप को पूरे तरीके से एक पर्सनैलिटी  समझते हो, एक व्यक्तित्व समझते हो, आप बाकी पूरी दुनिया को अपने से नीचे समझते हो, बाकी पूरी दुनिया से मेरा मतलब है जो इंसान नहीं हैं, उनको तो आप अपने से नीचे समझते हो, तो अहंकार ये बिलकुल नहीं चाहेगा कि आप उनके प्यार में पड़ो और जो आपसे ऊपर का है, वास्तव में ऊपर का है, जो बियॉन्ड ईगो है — जिसको चाहे तुम जो बोल लो टोटल, कम्पलीट, गॉड, परम, खुदा, इंटेलिजेंस; मर्ज़ी है तुम्हारी — अहंकार ये भी नहीं चाहता कि तुम उसके प्यार में भी पड़ो! “अहंकार ना तो तुम्हें उसके प्यार में पड़ने देता है, जिसे तुम क्षुद्र कहते हो और ना उसके प्यार में पड़ने देता है, जिसको वो कहीं न कहीं जानता ही है कि ये अति विराट है।
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जो तुम्हें अशांत करे, सो गलत

कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं होता। महत्वपूर्ण बस ये होता है कि जो कर रहे हो, वो तुम्हारा चैन न छीन ले। कोई भी काम महत्वपूर्ण या गैर महत्वपूर्ण नहीं होता। हमने कहा था न कि कुछ भी सही और गलत मानो ही मत, चाहे पूरी दुनिया में आग लग जाए, उसको गलत मत मानना। गलत बस एक बात; क्या?
अशांति।
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योग है अपनी बेड़ियों को अपनी ही ज्वाला में गलाना

हम में से अधिकांश जीवन को आदतों के पीछे से देखते हैं। हम जीवन से इतने एक हो चुके होते हैं, इतने अभ्यस्त हो चुके होते हैं कि जो भी चल रहा होता है, हमें सहज ही लगता है। कुछ भी हमें चौंकाता नहीं है। जो भी हमारे सामने आता है, हम कहते हैं, ऐसा ही तो होता है, यही तो जीवन है; दुनिया ऐसी ही तो है, संसार ऐसे ही तो चला है और चलेगा। हम में किसी प्रकार का विरोध उठना तो छोड़िये, सवाल भी नहीं उठता। बोध तो छोड़िये, जिज्ञासा भी नहीं उठती। हम बस स्वीकार किये जाते हैं और ये स्वीकार, अप्रतिरोध नहीं है। क्योंकि जो स्वतंत्र चैतन्य प्रतिरोध कर सके, वो हमारे पास होता ही नहीं है। जो मन, होनी पर सवाल उठा सके, वो मन हमने कहीं दबा दिया होता है। तो निष्पत्ति ये होती है कि खौफ़नाक से खौफ़नाक मंज़र भी हमें साधारण लगता है। और साधारण वैसे नहीं लगता जैसा किसी ज्ञानी को लगे, साधारण ऐसे लगता है कि, खौफ़ तो जीने का तरीका है ही ना। इसी को तो जीवन बोलते हैं, तो अचम्भा कैसा?
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मुझे इतनी ठोकरें क्यों लगती हैं?

दुनिया के लिए अमर होने का अर्थ है: समय का लम्बा खिंच जाना और सत्य में अमरता का अर्थ है: समय का विलुप्त हो जाना क्यूंकि समय कितना लम्बा भी खिंचे, उसकी लम्बाई को आप एक संख्या में बाँध सकते हैं, एक संख्या द्वारा व्यक्त कर सकते हैं। दुनिया में जो कुछ भी बड़े से बड़ा होगा, वो दुनिया के तल पर ही होगा। बडे से बड़ा, होगा दुनिया के तल पर और जो कुछ भी दुनिया के तल पर है, उसमें आखिरी बिंदु ज़रूर आएगा इसीलिए वो वास्तव में बड़ा हो नहीं सकता। सत्य में वो सब कुछ क्षुद्र, नगण्य और भ्रम बराबर ही है, जो ख़त्म हो जाता है।

सत्य में है ही वही, जिसकी न कोई शुरुआत हो, न कोई अंत हो।
तुम कैसा जीवन जी रहे हो, जानने के लिए बस ये परख लेना, क्या कुछ है तुम्हारे पास ऐसा, जो समय से बच निकलेगा? क्या है तुम्हारे पास ऐसा, जो मौत से बच निकलेगा? क्या है तुम्हारे पास कुछ ऐसा, जो तुम्हारे पास दुनिया में आने से पहले भी था? कुछ भी ऐसा है तुम्हारे पास, जो तुम्हें दुनिया ने न दिया हो, कुछ ऐसा पा लो, बस वही सत्य है; बाकी सब बस प्रतीति होता है।
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अष्टावक्र-जनक महासंवाद
आचार्य प्रशांत के साथ 6 अप्रैल से

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मन की दौड़

‘मन का होना ही एक दौड़ है’ और व्यर्थ ही नहीं दौड़ रहा, उसे वास्तव में पहुंचना है; वो बेचैन है, उसकी बेचैनी झूठी नहीं है लेकिन मन का दौड़ना वैसा ही है, जैसे कोई इस कमरे के भीतर-भीतर दौड़ता रहे

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