सत्य न पढ़ा जाता है, न सुना जाता है, सत्य मात्र हुआ जाता है

जब इस पूरे खेल का तत्व ही छल है तो उसकी बारीकियों में क्या जाना? जब पता ही है कि जो पूरी छवि आपके सामने लाई जा रही है, वो छवि ही, स्वप्न मात्र है। तो फिर उस स्वप्न में कौन-कौन से चरित्र हैं, इस पर क्या ध्यान देना? इन बारीकियों पर क्या गौर करना? ”बड़ा जबरदस्त सपना चल रहा है,” है तो सपना ही? क्या करोगे याद कर के कि सपने में कौन-कौन था और उससे तुम्हारा क्या सम्बन्ध था? जो भी हो, जैसा भी हो, है तो सपना ही।
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प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन पच्चीस से ज्यादा अद्वैत बोध शिविरों का आयोजन करने के बाद, इस महीने की 26 तारीख को अपना 28वां बोध शिविर आयोजित करने जा रही है।

28वां अद्वैत बोध शिविर: एक पुकार परम की 💐
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में समय बिताने और विभिन्न स्रोतों से लिए गए श्रेष्ठतम कोटि के ग्रंथों को पढ़ने का एक अनूठा अवसर है २८वां अद्वैत बोध शिविर।

शिविर का हिस्सा बनने हेतु, requests@prashantadvait.com पर एक ईमेल करें ।
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अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें:
श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661
श्री कुंदन सिंह: +91-9999102998
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कबीर के वचनों को समझने का प्रयत्न मानवता ने बारम्बार किया है। किन्तु संत को समझने के लिए कुछ संत जैसा होना प्रथम एवं एकमात्र अनिवार्यता है। संत जो कहते हैं उनके अर्थ दो तलों पे होते हैं – शाब्दिक एवं आत्मिक। समाज ने कबीर के वचनों के शाब्दिक अर्थ कर, सदा उन्हें अपने ही तल पर खींचने का प्रयास किया है, आत्मिक अर्थों तक पहुँच पाना उसके लिए दुर्गम प्रतीत होता है। आचार्य प्रशांत ने उन वचनों के आत्मिक अर्थों का रहस्योद्घाटन कर कुछ ऐसे मोती मानवता के समक्ष प्रस्तुत किये हैं जो जीवन की आधारशिला हैं। आज की परिस्थिति में जीवन को सरल एवं सहज भाव में व्यतीत कर पाने का साहस, आचार्य जी के शब्दों से मिलता है।

कबीर, जो सदा सत्य के लिए समर्पित रहे, उनके वचनों के गूढ़ एवं आत्मिक अर्थों से अनभिज्ञ रह जाना वास्तविक जीवन के मिठास से अपरिचित रह जाने के सामान है, कृपा को उपलब्ध न होने के सामान है।

प्रौद्योगिकी युग में थपेड़े खाते हुए मनुष्य के उलझे जीवन के लिए ये पुस्तक प्रकाश स्वरुप है।
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शिष्य कौन?

जो दिन-प्रतिदिन की छोटी घटनाओं से नहीं सीख सकता वो किसी विशेष आयोजन से भी सीख पाएगा, इसकी संभावना बड़ी कम है|

बुद्धिमान वही है जो साधारणतया कही गयी बात को, एक सामान्य से शब्द को भी इतने ध्यान से सुने कि उससे सारे रहस्य खुल जाएँ |

सत्य और संसार दो नहीं

धार्मिक आदमी वो नहीं है जो मंदिर जाता है, धार्मिक आदमी वो है जिसे मंदिर जाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती क्योंकि उसके लिए हर दिशा मंदिर है | वो जिस जगह खड़ा है वो जगह मंदिर है | वो मंदिर को अपने साथ लेकर चलता है | वो है, धार्मिक आदमी | वो विभाजन कर ही नहीं सकता | वो रेत पर खड़ा है तो रेत मंदिर है, पत्थर पर खड़ा है तो पत्थर मंदिर है, इमारत पर खड़ा है तो इमारत मंदिर है |

उसको किसी मूर्ति की आवश्यकता नहीं है, उसको किसी विशेष कक्ष की आवश्यकता नहीं है कि “यहाँ पर ही मेरी पूजा होगी” | जितनी भी मूर्तियाँ हैं, जो भी कुछ मूर्त रूप में है, वही पूजनीय है |

धर्म परम नास्तिकता की कला है

दुनिया इसलिए कभी धार्मिक हो नहीं पायी। क्योंकि हमने ये नहीं पूछा कि ‘दुनिया क्या है?’ हम यह पूछते हैं कि ‘दुनिया चल कैसे रही है?’ और अगर पूछेंगे कि ‘दुनिया क्या है’ तो पूछना पड़ेगा कि ‘मैं कौन हूँ?’ और ‘मैं कौन हूँ?’

यह पूछना बड़े घाटे का सौदा है, अहँकार को बड़ी चोट लगती है।

तो यह जो सारा खेल चल रहा है, यह ईगो का खेल है, उसपर बड़े-बड़े महल खड़े कर दिये गये हैं। लेकिन उसके नीचे वो छोटी-सी ईगो बैठी हुई है और कुछ भी नहीं।

बुनियाद उसकी वैसी ही है, जैसे कि कोई बादशाह अपनी हवस को समर्पित करके कोई बहुत बड़ा प्रेम महल खड़ा कर दे और वो प्रेम-महल दिखने में बहुत बड़ा है पर उसकी बुनियाद में क्या है- ऊँची-सी हवस। जैसे कि कोई बादशाह बहुत बड़ा मक़बरा अपने आपको समर्पित कर दे और वो दिखने में तो बहुत बड़ा है पर उसकी बुनियाद में क्या है- एक ऊँची इन्सिक्यूरिटी कि मेरे बाद भी मेरा नाम रहे।

ठीक उसी तरीके से हमने बातें बहुत बड़ी-बड़ी कर दी हैं। 50 ग्रंथ आ गये हैं, परमात्मा, गॉड, अल्लाह, पर उन सबके नीचे हमारी गन्धाती हुई ईगो बैठी है। उसको अगर आप हटा दें तो ये जो धर्मों का पूरा सिस्टम है, ये बिल्कुल ढ़ह जायेगा, चरमरा के गिरेगा। ताश का महल है ये, कुछ नहीं रखा है इसमें।

मैं लड़कियों से बात क्यों नहीं कर पाता?

ऐसे लोगों से बचना जिन्हें आँख बचा कर बात करने की आदत हो। और बहुत हैं ऐसे। ऐसे क्षणों से भी बचना जिसमें सहज भाव से, निर्मल भाव से, सरल होकर, निर्दोष होकर किसी को देख ना पाओ। ऐसे क्षणों से भी बचना।

एक नज़र होती है जो समर्पण में झुकती है, प्यारी है वो नज़र। और एक नज़र होती है जो ग्लानि में और अपराध की तैयारी में झुकती है, उस नज़र से बचना।

अलग-अलग धर्म क्यों हैं?

किसी ने उगता हुआ सूरज देखा । किसी ने बरसात का सूरज देखा । किसी ने अमेरिका में बैठकर देखा । किसी ने अफ्रीका में बैठकर देखा । और सबने देखा सूरज लेकिन आधा-तिरछा देखा या किसी माध्यम से देखा ।

अब जो देखने वाले थे, वो चले गए । जिन्होंने देखा था, वो चले गये । उनकी लिखी किताबें बची हैं । किताबों में ज़िक्र किसका है- ‘सूरज का और चश्मे का’ । सूरज तो पढ़ने वाले जान नहीं पाते क्योंकि सूरज तो बताने की चीज़ नहीं है । सूरज तो अनुभव करने की चीज है । सूरज तो जान नहीं पाते । हाँ, चश्मे को जान जाते हैं ।

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