मौत के डर को कैसे खत्म करूँ?

तुम शुरुआत यहीं से करो कि जानो कि तुम्हारे पास तो जो कुछ है वो छिन ही जाता है। तुम्हारे पास जो कुछ है उसमें सदा विराम लगता है, उसमें सदा अपवाद आतें हैं। बस इस नियम का कोई अपवाद नहीं है, किस नियम का? कि तुम्हारे पास जो कुछ है वो छिन जाएगा। इस नियम को ही अगर दिल से लगा लो तो यही जादू होगा। तुम पाओगी कि छिनने का खौफ़ मिट गया। कहीं न कहीं उम्मीद बाँध रखी है कि तुम्हारे पास जो कुछ है वो शायद न छिने। जब पूरी तरह स्वीकार कर लोगी कि यह सब कुछ तो एक न एक दिन जाना ही है और यह ज्ञान तुम्हारी नस-नस में बहे, तुम्हारी सांस-सांस में रहे। तुम्हें कुछ ख़ास लगे ही न।
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प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन पच्चीस से ज्यादा अद्वैत बोध शिविरों का आयोजन करने के बाद, इस महीने की 24 तारीख को अपना 27वां बोध शिविर आयोजित करने जा रही है।

ईसा मसीह के जन्म दिवस को हर्ष एवं उल्लास के साथ मनाने का इस बोध शिविर से बेहतर मौका कहाँ हो सकता है!

विश्व भर के आध्यात्मिक ग्रंथों का अध्ययन करने, आचार्य प्रशांत जी के संग समय बिताने, और गंगा किनारे बैठ खुदमें डूब जाने का भी यह एक अनूठा अवसर है।

शिविर का हिस्सा बनने हेतु, requests@prashantadvait.com पर एक ईमेल करें ।
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अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें:
श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661
श्री कुंदन सिंह: +91-9999102998
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न : http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट: https://goo.gl/fS0zHf

सत्य के साथ हुआ जाता है, फिर जो छूटता हो, छूटे

छोड़ने शब्द से ऐसा लगता है ज्यों छोड़ना महत्वपूर्ण था, ज्यों छोड़ी जा रही वस्तु पर ध्यान था। ऐसे नहीं छूटता। छूटता तब है जब पता भी न चले कि छूट गया। अगर छोड़ना महत्वपूर्ण हो गया तब तुम छोड़ कहाँ रहे हो? तब तो तुमने, बस दूसरे तरीके से, और ज़ोर से पकड़ लिया है।

सत्य के साथ हुआ जाता है, फिर जो छूटता हो, छूटे। परवाह तो तब हो जब हमें पता भी चले।

बोध और परितोष

सारा जो बोध-साहित्य है, बस वो यही है कि अंततः तुम चाहते ही यही हो कि थम जाऊँ, तो थम ही जाओ ना! दौड़ क्यों रहे हो?

जो जिस कारण भी दौड़ रहा है, क्यों दौड़ रहा है? कि कभी रुक सके|

इसीलिए दौड़ रहा है ना? जब रुकना ही ध्येय है, तो रुक ही क्यों नहीं जाते?

तुम रुक इसीलिए नहीं जाते क्योंकि तुमसे कहा गया है कि ‘रुकना आगे है’| पर जाननेवालों ने तुम्हें ये समझाया है कि आगा-पीछा कुछ होता नहीं| जो है, वो यही है| रुकना है तो तत्क्षण रुको! इसी पल रुको! आगे सिर्फ आशा है और पीछे सिर्फ़ यादें हैं| रुकना या होना बस इसी पल है|

‘यहाँ’ से बेहतर कोई जगह नहीं

कमी हमेशा तुलना के फ़लस्वरूप आती है।

तुमसे पुछा जाये कि प्रशांत महासागर में पानी कितना है? तो तुम कहोगे “बहुत सारा।”
तुमसे पुछा जाये कि “भारतीय महासागर में पानी कितना है”? तुम कहोगे, “बहुत सारा”।

मैं कहूँगा, “दोनों में से ज़्यादा पानी किसमें है?” तो तुम कहोगे “पहले वाले में ‘ज़्यादा’ है और दूसरे में ‘कम’ है।” अब दूसरे में कम कैसे हो गया?

और किसको ‘कम’ बोल रहे हो ?

(हँसते हुए) तुम एक महासागर को ‘कम’ बोल रहे हो क्योंकि तुमने उसकी तुलना कर दी। अब महासागर भी ‘कम’ हो गया!

तुलना मत करो, तो कोई कमी नहीं हुई है। जो हुआ है वही होना था।

वहीँ मिलेगा प्रेम

अनाड़ी मन जो होता है उसके लिए जमीन का प्रेम, जमीन से बंधे रहने की जंजीर बन जाता है। और जो ज्ञानी होता है उसके लिए ज़मीन का प्रेम, आसमान में उड़ने का पंख बन जाता है। अनाड़ी मन के लिए तथ्य सिर्फ एक बंद कोठरी रह जाते हैं, मुर्दा तथ्य। और जागृत मन के लिए, यही तथ्य सत्य का द्वार बन जाते हैं। जमीन तुम्हारा बंधन भी है और तुम्हारा अवसर भी। इसी से चिपके रह गए और ध्यान न दिया और समर्पित न हुए, तो इससे बड़ा बंधन नहीं है।

सँसार महा बंधन है, पर यही सँसार, मुक्ति का अवसर भी है। सब-कुछ तुम पर निर्भर करता है।

जीत में जीते नहीं, न हार में हारे

जो उचित है, वो करो । नतीज़ा क्या आता है, छोड़ो । क्योंकि कोई भी नतीजा आखिरी कब हुआ है? तो नतीजे को नतीजा कहना ही बड़ी बेवकूफी है । कभी कहीं जाकर के कहानी रूकती हो तो तुम बोलो ‘द एंड’ । जब कहानी कहीं रूकती ही नहीं तुम क्यों कहते हो कि कहानी का नतीजा यह निकला । अनंत कहानी है, तो कैसे पता कि चूक गये?

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