जब तुम नहीं रहते, तब शिव रहते हैं

तुमने नहीं प्राप्त कर लिया है| इस शब्द के साथ बहुत समय तक रहना पड़ेगा| तुमने कुछ नहीं प्राप्त कर लिया है| तुम खुद अपना

अभिनय का मतलब नकली होना नहीं है

आज तक गुस्सा कर के कोई खुश नहीं हुआ| नफ़रत कर के किसी को आनंद नहीं अनुभव हुआ| तुम खुद नहीं चाहते कि तुम्हें गुस्सा आए| तुम खुद नहीं चाहते तुम नफ़रत करो| ये सब चीज़े खुद अपने आप हट जाएँ क्योंकि तुम खुद इनको नहीं चाहते हो| पर तुम इन्हें पालते हो| क्यों? मन में वैहम गया है कि गुस्सा करने से मेरी अहमियत बढ़ती है| मन में एक वहम बैठ गया है कि नफ़रत करना ज़रूरी है अगर मुझे अपना प्यार सिद्ध करना है| तुम जानते हो हम नफ़रत अक्सर क्यों करते हैं? क्योंकि हम किसी को अपना प्यार सिद्ध कर रहे होते हैं|
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कदम-कदम पर तरीके मौजूद हैं तुमको क्षुद्रता में धकेलने के लिए|

बड़ी कम्पनियाँ बड़े ऑफिस बनाती हैं| और तुम्हारे भीतर हसरत जागती है कि मैं इन बड़े-बड़े ऑफिसों में काम करूँ| और तुम ये देख ही

कहीं भी मन क्यों नहीं लगता?

अपने आस-पास की दुनिया को देख लो या अपने ही मन को टटोल लो, तुम्हें यही दिखाई देगा कि कोई भी चीज़ ऐसी नहीं होती जिसमें मन लगा रह सके| कोई भी रिश्ता ऐसा नहीं होता| थोड़ी देर के लिए तुम्हें भ्रम ज़रूर हो जाएगा की मन लग गया है पर भ्रम टूटेगा| और जितनी बार वो भ्रम टूटेगा उतनी बार तुम भी टूटोगा|

मन लगेगा, दोहरा रहा हूँ, (लेकिन) किसी काम में नहीं लगेगा| हर काम में रहेगा| जहाँ हो, वहीँ लगेगा| तुम ऐसे आदमी की तरह हो जाओगे जिसका पेट भरा हुआ है, जिसका दिल भरा हुआ है, जो खूब मस्त है| अब वो जो भी करेगा, कैसा करेगा? मज़े में करेगा ना|

~आचार्य प्रशांत
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शून्य में नग्न रह जितने लिबास ओढ़ने हों,ओढ़ो

प्रेम एक माहौल है जिसमें सब कुछ हो रहा है। खा रहे हैं, उठ रहे हैं, पी रहे हैं सब प्रेम में हो रहा है। कि जैसे बाहर मौसम अच्छा है, तो जो भी करो अच्छे मौसम में हो रहा है। तो प्रेम एक मौसम की तरह है।
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अष्टावक्र-जनक महासंवाद
आचार्य प्रशांत के साथ 6 अप्रैल से

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