अर्थ द्वारा समझे तो अच्छा, बिना अर्थ समझे तो और अच्छा

सुना मात्र तब जाता है, जब शब्द अर्थहीन हो जाते हैं।

वास्तव में सुना तभी गया, जब भूल ही गए कि क्या कहा जा रहा है। हर कहने-सुनने का जो परम उद्देश्य है, वो ये भूल जाना ही है।
समझिएगा बात को। सुनने की निम्नतम अवस्था तो वही है कि शब्दों पर भी ध्यान नहीं गया और फिर आगे बढ़ते हो तो चलो, कम से कम शब्द कान में पड़ने लग गए। स्मृति ने काम करना शुरू किया। उनमें अर्थ भरने शुरू कर दिए, पर वास्तविक सुनना अभी भी नहीं हो पाया।
असली सुनना तब हुआ, जब भूल ही गए कि किसी ने कहा क्या था?
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