कर्त्तव्य सज़ा है नासमझी की

कर्त्तव्य संसारो न तां पश्यन्ति सूरयः । शून्याकारो निराकारा निर्विकारा निरामयाः ॥ (अष्टावक्र गीता अध्याय १८, श्लोक ५७) वक्ता: ‘सेंस ऑफ़ ड्यूटी’, कर्त्तव्यों के बारे में बात

कैसे जियें?

जो भी कुछ कर रहे हो, खेल रहे हो तो पूरी तरह खेलो, सुन रहे हो तो सिफ सुनो, खा रहे हो तो सिर्फ खाओ, पढ़ रहे हो तो सिर्फ पढ़ो, बोल रहे हो तो पूरा ध्यान सिर्फ बोलने में, तब भूल जाओ कुछ भी और, यही ज़िन्दगी है, यही जीवन है। प्रतिपल जो हो रहा है, यही तो जीवन है, इससे अलग थोड़ी कुछ होता है जीवन।

टाल-मटोल की आदत

जिसमें तुम्हें महत्व नहीं समझ आता, जो तुम दूसरों के इशारे पर बस ज़ोर-ज़बरदस्ती में कर रहे हो, कि किसी ने धक्का दे दिया, तुम धकेले जा रहे हो और कर रहे हो उसमें टालमटोल होती है। तुम्हारे जीवन में इतनी ऊब इसलिए है क्योंकि कुछ भी तुम्हारा अपना नहीं है जीवन में। जब कुछ अपना होता है तो आदमी उसे कभी नहीं टालता। टाल सकता ही नहीं है।

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