जब मन रौशन हुआ तब दीवाली जानो

अँधेरे के पास अँधेरे के तर्क होते हैं। रौशनी की तरफ बढ़ने का कोई तर्क नहीं होता है। रौशनी की तरफ बढ़ने का यही मतलब होता है कि अँधेरे की जो जंज़ीरें थीं, अँधेरे के जो तर्क थे, अँधेरे के जो एजेंट थे, जो दूत थे उनको कीमत देना छोड़ा। त्यौहार का मतलब ही यही है कि सत्य को और सत्य कोई बाहरी बात नहीं है, आप जानते हैं सत्य को; त्यौहार का मतलब ही यही है कि सत्य को कीमत दी। इधर-उधर के प्रभावों से हमेशा दबे रहे थे, अब उन प्रभावों से बचे। अँधेरे की जंजीरों को, अँधेरे के षड़यंत्र को काट डाला।
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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झूठी आस्तिकता

अगर तुमने गीता जान ली तो तुमसे जन्माष्टमी उस तरीके से मनाई ही नहीं जायेगी जैसे लोग मनाते हैं। तुम वो सब कर ही नहीं पाओगे, जो दुनिया करती है कृष्ण के नाम पर। एक बार तुमने कृष्ण को जान लिया तो तुम कहोगे कि “छि:, कृष्ण के नाम पर यह सब होता है!” तुमने राम को जान लिया तो तुमसे दीवाली, दशहरा वैसे मनाये ही नहीं जायेंगे, जैसे दुनिया मनाती है।

दीवाली, दशहरा मना ही वही लोग रहे हैं, जिनका राम से कोई नाता नहीं। और जन्माष्टमी पर सबसे ज्यादा उछल-कूद वो कर रहे हैं, जिन्हें कृष्ण से कोई लेना-देना नहीं। उन्हें उछल-कूद से लेना देना है, मनोरंजन है। दीवाली, दशहरा क्या है उनके लिए? मनोरंजन है। कोई राम की भक्ति थोड़े ही है।

भगवान क्या हैं ?

स्वतंत्रता क्या है? हम नहीं जानते। सत्य क्या है? हम नहीं जानते। शिक्षा क्या है? हम ये भी नहीं जानते। मैं कौन हूँ? ये तो बिल्कुल ही नहीं जानते। पर इन सब बातों के बारे में हमने कुछ-कुछ सुन रखा है और इनको मान लिया है। तो इस प्रश्न को अलग से लेकर के नहीं देखा जा सकता कि ‘भगवान् क्या है, सत्य क्या है ?’

नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः

वक्ता: एक उपनिषदिक् वाक्य है: नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः जो बलहीन है वो कभी भी अपने करीब नहीं पहुँच सकता| जो इतना डरपोक, मुर्दा और निर्बल है

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