प्रतियोगी मन – हिंसक मन

प्रश्न: सर प्रतियोगिता से डर लगता है। ऐसा क्यों? वक्ता: प्रतियोगिता का डर है क्योंकि प्रतियोगिता का अर्थ ही है, डर। केवल डरपोक लोग ही

अहं अगनि हिरदै जरै

दिल में लपटें ही लपटें हैं अहंकार की | वो गुरु को भी जला डालेंगी | कोई कीमत नहीं छोड़ेंगी उसकी | पुरानी एक कहानी है जो कहती है कि चाँद के सबसे प्यारे दोस्त तारे हैं| और चाँद को जिसकी ओर देखना बिल्कुल नहीं सुहाता, वो सूरज है| इसी कारण चाँद सिर्फ तब आता है, जब सूरज नहीं होता | तारों के साथ खेलता है| पूरी रात तारों के साथ रहता है| सूरज के साथ कभी नहीं रहता |

कर्त्तव्य सज़ा है नासमझी की

कर्त्तव्य संसारो न तां पश्यन्ति सूरयः । शून्याकारो निराकारा निर्विकारा निरामयाः ॥ (अष्टावक्र गीता अध्याय १८, श्लोक ५७) वक्ता: ‘सेंस ऑफ़ ड्यूटी’, कर्त्तव्यों के बारे में बात

आँखें फिर से खोलना

वक्ता: यह प्रसंग गीता के दूसरे अध्याय के अंतर्गत दिया है| अर्जुन ने योगभ्रष्ट के बारे में पूछा है| योगभ्रष्ट कौन है, उसके विषय में अर्जुन ने खुद ही

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