शादी करने से ज़िम्मेदारी नहीं सीख जाओगे || आचार्य प्रशांत (2019)

संत और संसारी में यही अंतर है। संत, अनजाने अपरिचित व्यक्ति को भी अपना जानता है, और उसके प्रति अपनी ज़िम्मेदारी निभाता है। और संसारी, जिस घर में रहता है, जिनके साथ रहता है, वो उनके प्रति भी स्वार्थ से ही भरा होता है, और कोई ज़िम्मेदारी नहीं जानता।

भले ही बाहर-बाहर ज़िम्मेदारी निभा रहा हो, कि रुपया दे दिया, पैसा दे दिया। पर सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी तो प्रेम होती है।  प्रेम नहीं होगा उसके पास। प्रेम नहीं होगा, समझ नहीं होगी।

सच क्या कभी तुम्हें भाएगा?

कई मायनो में योगभ्रष्ट, वियोगी से भी ज़्यादा अभागी होता है क्यूंकि वियोगी को तो अवसर मिला नहीं; योगभ्रष्ट को मिला और वो चूक गया। तुम यहाँ आए हो — अद्वैत में — मेरे समीप, ये सौभाग्य की भी बात है और बड़े से बड़ा खतरा भी है तुम्हारे लिए। सौभाग्य इसलिए क्यूंकि मौका है, अवसर है जान सकते हो, अपनेआप को पा सकते हो, और खतरा इसमें ये है कि ये ऊँची से ऊँची संभावना है, इससे अगर चूक गए, तो अब जिंदगी भर कुछ नहीं पाओगे। क्यूंकि जो उच्चतम तुम्हें मिल सकता था वो मिला, दैव्य मेहरबान हुआ, अनुग्रह हुआ, बारिश हुई; तुम्हीं भीग ना पाए। तो बढ़िया है, अच्छा है, कोई ख़ास ही घटना होगी, जो घटनी होती है। आमंत्रण सबको आते हैं; सब आमंत्रित नहीं हो पाते। तुम आमंत्रित हो रहे हो, सौभाग्य है।
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भक्ति योग एवं पुरुषोत्तम योग आचार्य प्रशांत के साथ
6 मार्च से आरम्भ
आवेदन भेजने हेतु: requests@prashantadvait.com पर ईमेल करें
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श्री अपार मेहरोत्रा: +91-9818591240
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट: https://goo.gl/fS0zHf

प्रेम – मीठे-कड़वे के परे

जानते हो लोग दुखी क्यों हैं? इसलिए नहीं कि दुःख आवश्यक है, इसलिए क्योंकि उन्हें सुख की तलाश है| सुख की तलाश, दुःख को स्थाई बना देती है| जो सुख को पकड़ता है, वो दुःख को भी पकड़ लेता है|

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