प्रेम बाँटना ही प्रेम पाना है

प्रेम क्या है? प्रेम है: मन का शांत हो जाना, स्रोत के समीप आना। मन हमेशा शान्ति की ओर आकर्षित रहता है, इसी आकर्षण को प्रेम कहते हैं। मन हमेशा खिंचा चला जाता है, किसी की तरफ़, उसी को प्रेम कहते हैं। और किसकी तरफ़ खिंचता है? शान्ति की तरफ खिंचता है। मन शान्ति ही चाहता है , हमेशा। जैसे-जैसे मन शांत होता जाता है, वैसे-वैसे आपका कुछ पकड़ के रखने का जज्बा ख़त्म होता जाता है। जो कुछ भी आपने पकड़ के रखा होता है, वो आप छोड़ने लग जाते हैं। वो आपके माध्यम से बँटना शुरू हो जाता है – ये प्रेम है। और जैसे-जैसे आप छोड़ते जाते हैं, मन और शांत होता जाता है। आपके छोड़ने की क्षमता बढ़ती जाती है। आप दिए जा रहे हो, और देने में ही आपका उल्लास है। आपका मन ही नहीं करता, कंजूस की तरह पकड़ के रखने का।
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मुझे इतनी ठोकरें क्यों लगती हैं?

दुनिया के लिए अमर होने का अर्थ है: समय का लम्बा खिंच जाना और सत्य में अमरता का अर्थ है: समय का विलुप्त हो जाना क्यूंकि समय कितना लम्बा भी खिंचे, उसकी लम्बाई को आप एक संख्या में बाँध सकते हैं, एक संख्या द्वारा व्यक्त कर सकते हैं। दुनिया में जो कुछ भी बड़े से बड़ा होगा, वो दुनिया के तल पर ही होगा। बडे से बड़ा, होगा दुनिया के तल पर और जो कुछ भी दुनिया के तल पर है, उसमें आखिरी बिंदु ज़रूर आएगा इसीलिए वो वास्तव में बड़ा हो नहीं सकता। सत्य में वो सब कुछ क्षुद्र, नगण्य और भ्रम बराबर ही है, जो ख़त्म हो जाता है।

सत्य में है ही वही, जिसकी न कोई शुरुआत हो, न कोई अंत हो।
तुम कैसा जीवन जी रहे हो, जानने के लिए बस ये परख लेना, क्या कुछ है तुम्हारे पास ऐसा, जो समय से बच निकलेगा? क्या है तुम्हारे पास ऐसा, जो मौत से बच निकलेगा? क्या है तुम्हारे पास कुछ ऐसा, जो तुम्हारे पास दुनिया में आने से पहले भी था? कुछ भी ऐसा है तुम्हारे पास, जो तुम्हें दुनिया ने न दिया हो, कुछ ऐसा पा लो, बस वही सत्य है; बाकी सब बस प्रतीति होता है।
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अष्टावक्र-जनक महासंवाद
आचार्य प्रशांत के साथ 6 अप्रैल से

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जो पकड़ेगा वो गँवायेगा

प्रेम को आप आँख से देख नहीं पाएंगे। आनंद को आप हाथ से पकड़ नहीं पाएंगे। मुक्ति का आप कोई चित्र नहीं बना सकते। सत्य का कोई नाम नहीं होता लेकिन ये हैं, और यही वास्तविक हैं। जीसस कह रहे हैं, इन्हीं की दुनियां मे तुम आखिरी रहोगे। जो द्वैत की दुनिया में अव्वल है, वो अद्वैत की दुनिया में आखिरी रहेगा। ना उसे सत्य मिलेगा, ना प्रेम मिलेगा, ना आनंद, ना मुक्ति।
जो खूब पदार्थों के पीछे भाग रहा है, जो खूब प्रतिष्ठा कमा रहा है, जिसने ज़मीन को, पत्थर को और आसमान को, इन्हीं को सच मान लिया है, वो असली दुनिया में, अपनी भीतरी दुनिया में — जहाँ उसका घर ही है — वहां वो तड़पेगा, वहां उसे कुछ न मिलेगा, वहां वो कतार में आखिरी नज़र आएगा।
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सत्य न पढ़ा जाता है, न सुना जाता है, सत्य मात्र हुआ जाता है

जब इस पूरे खेल का तत्व ही छल है तो उसकी बारीकियों में क्या जाना? जब पता ही है कि जो पूरी छवि आपके सामने लाई जा रही है, वो छवि ही, स्वप्न मात्र है। तो फिर उस स्वप्न में कौन-कौन से चरित्र हैं, इस पर क्या ध्यान देना? इन बारीकियों पर क्या गौर करना? ”बड़ा जबरदस्त सपना चल रहा है,” है तो सपना ही? क्या करोगे याद कर के कि सपने में कौन-कौन था और उससे तुम्हारा क्या सम्बन्ध था? जो भी हो, जैसा भी हो, है तो सपना ही।
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प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन पच्चीस से ज्यादा अद्वैत बोध शिविरों का आयोजन करने के बाद, इस महीने की 26 तारीख को अपना 28वां बोध शिविर आयोजित करने जा रही है।

28वां अद्वैत बोध शिविर: एक पुकार परम की 💐
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में समय बिताने और विभिन्न स्रोतों से लिए गए श्रेष्ठतम कोटि के ग्रंथों को पढ़ने का एक अनूठा अवसर है २८वां अद्वैत बोध शिविर।

शिविर का हिस्सा बनने हेतु, requests@prashantadvait.com पर एक ईमेल करें ।
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अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें:
श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661
श्री कुंदन सिंह: +91-9999102998
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कबीर के वचनों को समझने का प्रयत्न मानवता ने बारम्बार किया है। किन्तु संत को समझने के लिए कुछ संत जैसा होना प्रथम एवं एकमात्र अनिवार्यता है। संत जो कहते हैं उनके अर्थ दो तलों पे होते हैं – शाब्दिक एवं आत्मिक। समाज ने कबीर के वचनों के शाब्दिक अर्थ कर, सदा उन्हें अपने ही तल पर खींचने का प्रयास किया है, आत्मिक अर्थों तक पहुँच पाना उसके लिए दुर्गम प्रतीत होता है। आचार्य प्रशांत ने उन वचनों के आत्मिक अर्थों का रहस्योद्घाटन कर कुछ ऐसे मोती मानवता के समक्ष प्रस्तुत किये हैं जो जीवन की आधारशिला हैं। आज की परिस्थिति में जीवन को सरल एवं सहज भाव में व्यतीत कर पाने का साहस, आचार्य जी के शब्दों से मिलता है।

कबीर, जो सदा सत्य के लिए समर्पित रहे, उनके वचनों के गूढ़ एवं आत्मिक अर्थों से अनभिज्ञ रह जाना वास्तविक जीवन के मिठास से अपरिचित रह जाने के सामान है, कृपा को उपलब्ध न होने के सामान है।

प्रौद्योगिकी युग में थपेड़े खाते हुए मनुष्य के उलझे जीवन के लिए ये पुस्तक प्रकाश स्वरुप है।
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कब सुनोगे उसकी आवाज़?

एक विचित्र सा जमावड़ा है, माहौल है जिसमें आप कभी खेंच कर, कभी धकियाए जाकर डॉक्टर के पास आते हैं पर यह पक्का करके आते हैं कि बीमारी छोड़नी नहीं है। यह ऐसी बीमारी है जिसने अस्पताल को भी अपनी गिरफ्त में ले लिया है। जो बीमार अस्पताल को भी अपने अनुकूल बना ले उसका कोई इलाज अब संभव नहीं है।
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प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन पच्चीस से ज्यादा अद्वैत बोध शिविरों का आयोजन करने के बाद, इस महीने की 24 तारीख को अपना 27वां बोध शिविर आयोजित करने जा रही है।

ईसा मसीह के जन्म दिवस को हर्ष एवं उल्लास के साथ मनाने का इस बोध शिविर से बेहतर मौका कहाँ हो सकता है!

विश्व भर के आध्यात्मिक ग्रंथों का अध्ययन करने, आचार्य प्रशांत जी के संग समय बिताने, और गंगा किनारे बैठ खुदमें डूब जाने का भी यह एक अनूठा अवसर है।

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जिसने माँगा नहीं उसे मिला है

हम अपनी ही जड़ों को काटते चले हैं| हमें भय है अपने ही विस्तार से|

किसी ने कहा है कि, “हमें किसी से डर नहीं लगता, हमें अपनी ही अपार सम्भावना से डर लगता है|”

कहीं न कहीं हमें पता हैं कि हम अनंत हैं| कहीं न कहीं, हमें पता है कि क्षुद्रता हमारा स्वभाव नहीं| हम अपनेआप से ही डरते हैं, अपनी ही संभावना से बड़ा खौफ़ खाते हैं| अगर हमें हमारी संभावना हासिल हो गयी, तो होगा क्या हमारे छोटे-छोटे गमलों का? हमें उनसे बाहर आना पड़ेगा|

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