आदमी की खोपड़ी कभी नहीं भरती

“बी योरसेल्फ” मतलब क्या? हम सभी एक प्रभावित जीवन जीते हैं । तुम घर जाते हो, टी वी खोलते हो, उसमें नवीनतम मोबाइल का विज्ञापन आता है, और वो विज्ञापन तुमको पाँच सौ बार दिखाया जाता है। और तुम कहते हो कि मुझे भी यही खरीदना है। और फिर तुम लड़ जाते हो, “मेरी मर्ज़ी है मुझे खरीदना है।” तुम्हारी मर्ज़ी थी? वो इच्छा तुम्हारे भीतर घुसाई गयी है। जबरन, बलात, घुसाई गयी है, तुम्हारे भीतर। और तुम कहोगे, “नहीं ये मेरी…।” ये जो मोबाइल है, ये तुम्हारी ग़ुलामी का सबूत है। ये जो मोबाइल तुम खरीदोगे, वो निशानी है, सबूत है, तुम्हारी ग़ुलामी का, निशानी है कि कैसे तुम प्रभावित हुए, कैसे तुम चले गए उसे खरीद लाए।

“बी योरसेल्फ़” कहने का हक़ सिर्फ उसको है, जो इन सब प्रभावों से परे हट के, इन प्रभावों को देखना जानता हो। जिसके मन में जब इच्छाएँ उठें, तो वो उन इच्छाओं में बह न जाए। वो उन इच्छाओं को देख पाए। वो तुरंत समझ पाए, कि इच्छा उठी। और वो समझ पाए कि इच्छा क्यों उठी? और वो उस इच्छा का गुलाम बन के न बैठ जाए।

उसके मन में सपने उठें, तो वो ये देख पाए कि ये सपना कहाँ से आ रहा है, समझ गया। समझ गया, कहाँ से आ रहा है। वो समझे, समझे। और फिर वो कहेगा, “बी योरसलफ”; और किसी को हक़ नहीं है “बी योरसेल्फ़” कहने का।
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तुम्हें पानी का कुछ पता नहीं लेकिन तुम्हें प्यास का तो पता है

कोई पागल हो गया है| वो भूल गया है पानी का नाम, स्मृति का लोप हो गया है| ठीक? स्मृति का लोप हो गया है।

न संदेह न संशय

आप अगर पाते हैं  कि आपकी ज़िंदगी में क्षुद्रता, संकीर्णता, तनाव, खिंचाव बहुत है तो साफ़ समझ लीजिए कि बुद्धि तो है आप के पास, समर्पण जरा नहीं है। बुद्धि, संसार का माया जाल तो काट सकती है पर माया के श्रोत तक आपको नहीं पहुँचा सकती। आप अधर में टंगे रह जाएँगे, माया तो कटेगी और ब्रह्म मिला नहीं इसी को क्या कह गये है कबीर “माया मिली न राम” । इससे तो भला ये होता कि माया के सपनों में ही डूबे रहते, भ्रम में ही खेलते रहते। माया तो गई, अब दिखाई दे जाता है कि ये जो इन्द्रियगत आकर्षण है, इसमें कुछ रखा नहीं है, ये तो दिख जाता है पर किस में कुछ रखा है ये समझ नहीं आता है। बड़ी दुविधा की स्तिथि है माया मिली न राम। माया को ज्ञान ने काटा पर समर्पण था नहीं तो राम तक पहुँचे नहीं। उसी राम को ब्रह्म कहा गया है, एक ही है।

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सोचने के अलावा और कोई चिंता नहीं होती

सारी झुंझलाहट तुम्हारी शुरू किस क्षण होती है, कभी देखा तुमने ये? तुम्हारी सारी झुंझलाहट शुरू कब होती है? तुम सो रहे हो, और तुम्हें

जो संसार से मिले सो समस्या; समस्या का साक्षित्व है समाधान

सारी चिंता, या सारी प्रसन्नता शुरू किस समय होती है? जब आँखों के सामने संसार आता है, और संसार का बड़ा हिस्सा है समाज, जो इंसान ने बनाया, ये पूरा मॉहौल। ये जैसे ही इन्द्रियों के माध्यम से मन में घुसता है, आक्रमण करता है वैसे ही चिंता शुरू, और इसका कोई उपचार नहीं है, क्योंकि इसकी परिभाषा ही यही है। अगर इसने मन को जकड़ लिया, तो चिंता होनी ही होनी है। तुमने आँख खोली और बाहर उपद्रव देखा, चिंता शुरू, क्योंकि उपद्रव सीधा आँखों से घुस कर के मन तक पहुँचा और मन को अपनी गिरफ्त में ले लिया। तुम कुछ कर नहीं पाओगे। तो ये तो बड़ी लाचारगी की हालत हो गयी, क्या करें? कुछ करा जा सकता है। करा ये जा सकता है कि तुम अपने आप को मन से ज़रा हटा लो, मन तो पकड़ में आ ही जाएगा संसार की क्योंकि मन बना ही संसार से है।
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