व्यर्थ है मन को बाँधना

जिस प्रकार के अपराध जिस समाज में सबसे ज्यादा होते हैं वो समाज वही है जिस ने उन बातों पर सबसे ज्यादा बंदिश लगा रखी होती है। जितना दबाओगे तुम विचार को उतनी ऊर्जा दोगे। तुम सोचते हो की दबाने से विचार चला गया। मन हँसता है मन कहता है, “पगले, तुम जानते भी नहीं हो कि वो दबाने से जाता नहीं है वो स्प्रिंग की तरह है, स्प्रिंग को दबाओ तो स्प्रिंग छोटी हो जाती है पर साथ ही वो कुछ इकठ्ठा कर लेती हो ? क्या ? जितनी उर्जा तुमने इस्तेमाल की उसको दबाने के लिए, स्प्रिंग उसको पी गयी है तुमको लग रहा है स्प्रिंग तो गयी, छोटी सी हो गयी है, कहाँ बची? तुमको पता भी नहीं है अब होगा क्या? तुम्हारी ही इस उर्जा का इस्तेमाल कर के अब वो स्प्रिंग उछलेगी और फिर तुम ये कहोगे ये ? मैं ऐसा कैसे कर सकता हूँ? ये तुम्हीं ने किया है।

उसको दबाने की कोशश कर कर के तुमनें उसको ताकतवर बना दिया है। ये हत्यारे, ये बड़े बड़े लुटेरे, ये बलात्कारी, तुम्हें लगता है कहाँ से आते हैं ? ये सब दमन के परिणाम हैं, तुम इतना दमन करते हो कि अंततः विस्फ़ोट हो जाता है। तुम अपने आप को ही इतना दबाते हो कि अंत में बिलकुल ज्वालामुखी फटता है और फिर तुम कहते हो, “ये क्या हो गया?” उदाहरण के लिए जो लोग कभी गुस्सा व्यक्त नहीं करते, वो जिस दिन गुस्से में आते हैं, उस दिन दूर-दूर रह लेना। जो आदमी बिलकुल पी जाता हो वो जिस दिन फटता है, जो आदमी बात-बात पर चिढ़ जाता है, बात-बात पर गुस्सा व्यक्त कर देता है वो ठीक है। वो कोई बड़ा नुकसान नहीं पँहुचा सकता लेकिन जो आदमी कभी गुस्सा व्यक्त न करता हो उसे भगवान बचाए। वो जिस दिन फटता है उस दिन दो-चार लाशें गिरती हैं। क्योकि वो जो उसने व्यक्त नहीं होने दिया वो उसके भीतर अब इकठ्ठा हो रहा है, इकठ्ठा हो रहा है। फिर फटेगा, जबरदस्त रूप से फटेगा।

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तुम्हारी ज़िन्दगी में ऐसा है क्या जो दुनिया से निराला हो?

शर्त बस उसी ईमानदारी की है, चाहे भीतर देखो, चाहे बाहर| भीतर देखने के लिए जितनी ईमानदारी चाहिए, उतनी ही ईमानदारी बाहर देखने के लिए

जन्म देखो तो अपना देखो, मृत्यु देखो तो अपनी देखो

किसी को जन्मते देखो तो अपना जन्म याद कर लो, तुम भी ऐसे ही जन्मे थे| आज तुम किसी का जन्मोत्सव देखते हो तुम्हे देर नहीं

तुम दुनिया से भिन्न नहीं हो

दो देश नहीं लड़ते, हिंसा सर्वप्रथम मनुष्य के मन में जन्म लेती है| बड़े से बड़े बम की जो उर्जा है वो भौतिक उर्जा नहीं है वो मानसिक उर्जा है| तुम ये मत समझ लेना कि परमाणु हथियार  भौतिक उर्जा  से चलता है, वो मानसिक उर्जा से चलता है| दिखती भौतिक है, तुम उसे नाप सकते हो तुम कह सकते हो कि इतने मेगा टन का विस्फोट था इतनी जूल ऊर्जा इसमें से निकली, किसी भी तरीके से नाप सकते हो पर ध्यान से देखोगे तो समझ आएगा कि वो उर्जा तुम्हारी घृणा की है| वो उर्जा यूरेनियम की या प्लूटोनियम की बाद में है सर्वप्रथम वो उर्जा तुम्हारी घृणा की उर्जा है|

आचार्य प्रशांत
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सत्र देखें: आचार्य प्रशांत: तुम दुनिया से भिन्न नहीं हो (You are not separate from the world)

 
 

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कामवासना और प्रेम में क्या अंतर है?

तुम किसी औरत के पास जाते हो, कोई औरत किसी आदमी के पास जाती है। दोनों, वास्तव में, न आदमी से सरोकार रख रहे हैं, न औरत से सरोकार रख रहे हैं, हर आदमी को परमात्मा चाहिए। तुम इसमें भी परमात्मा खोज रहे हो, इन सवालों में भी, उस पानी में भी, खाना खाने जाओगे, उसमें भी, कोई नौकरी करोगे, उसमें भी, किसी से मिलोगे उसमें भी, और सम्भोग के क्षण में, औरत में भी। हर आदमी, औरत के माध्यम से परमात्मा को पाना चाहता है; हर औरत, आदमी के माध्यम से परमात्मा को पाना चाहती है। यही कारण है, कि आदमी और औरत का रिश्ता, कभी बहुत पक्का हो नहीं पाता।

आचार्य प्रशांत
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