न चिंता न चाहत, स्वभाव तुम्हारा है बादशाहत

ये जो मुंह का लटकाना है, इसको समझलो ये सज़ा है। कोई न कोई तो रहा होगा जिसने प्रेम से समझाया होगा। कहीं से तो आवाज़ आई होगी कि “मान जाओ। ” जब नहीं माने, करली अपनी, तो फिर मिलती है सज़ा। और उससे बच तो पाते नहीं। कोई व्यक्ति मारता है, तो शिकायत भी कर पाते हो, परिस्थितियाँ ऐसा थपेड़ा देती हैं कि शिकायत भी नहीं कर पाते। पर उनके पंजों के निशान गाल पर ज़रूर नज़र आते हैं। अब किसके खिलाफ शिकायत दर्ज कराओगे? अब बस यही बोल पाते हो, “अरे! किसमत खराब है। मैं क्या करूँ? मेरे साथ ऐसा हो गया। ”
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बंधन चाहने से बंधन मिलता है और मुक्ति चाहने से भी बंधन ही मिलता है

जो तुम्हारे सुन्दरतम सपने हैं, वो साकार हो भी गए, ईमानदारी से बताओ, संतुष्ट हो जाओगे? और ऐसा तो नहीं है कि कभी तुम्हारा कोई स्वप्न साकार हुआ नहीं है, कभी-कभी तो तुम्हारी चाहतें पूरी भी हुई हैं।
उनसे खिल गए तुम? उनसे भर गए तुम? उधर माने क्या? उधर माने स्वप्न, उधर माने चाहतों का, भविष्य का, हसरतों का संसार, उधर माने कल्पना। इन कल्पनाओं ने तुम्हें कोई पूर्ति दी है आज तक? दी है? नहीं दी है, तो अब कैसे दे देंगी? जो आज तक नहीं हुआ, क्यों उम्मीद कर रहे हो कि तुम्हारी ज़िन्दगी के चंद बचे हुए सालों में हो जाएगा?
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क्रांति है अपना साक्षात्कार, महाक्रांति अपना सहज स्वीकार

जब जो होता है उससे तुम राज़ी हो जाते हो, तो तुम्हें फिर वो मिल जाता है, जो तुम्हारे राज़ी होने से आगे की बात है। परमात्मा कहता है कि जब तुझे वो ही पसंद नहीं, जो मैंने तुझे दिया, तो तुझे देने वाला कैसे पसंद आ जाएगा? जो भी उसने तुम्हें दिया है, भले ही उसने तुम्हें बदबू दी है, तुम पहले उसका सहज स्वीकार करो। फिर जिसने दिया है, वो भी तुम्हें मिल जाएगा। मैं तुम्हें कोई उपहार दूँ, तुम्हें वही पसंद नहीं आ रहा, तो तुम्हें देने वाला कैसे पसंद आएगा? तुम जो भी हो, जैसे भी हो, तुम्हें वही मिला है। उसके साथ शान्ति रखो। स्वीकार रखो। वही मिला है तुम्हें।

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मन की उचित दशा क्या?

सारे जो खंड हैं मन के, वो उठते-बैठते रहते हैं, वो केवल वस्तुओं से आसक्त हैं, और वस्तुएं बदलती रहती हैं समय के साथ, स्थान के साथ, पर मन का ‘वो’ एक बिंदु अचल है। उसको तो एक ही दिशा जाना है और वो एकटक देखे जा रहा है। मन का बाकी माहौल कितना बदलता रहे, वो एक है अकेला, जो उधर को ही देख रहा है। जैसे कि एक कमरे में बहुत सारे बच्चे मौजूद हों, और उस कमरे में खेलने के हज़ार खिलौने रखें हैं, और मिठाइयाँ रखी हैं, और मनोरंजन के उपकरण रखे हैं, और बहुत सारे बच्चे हैं, जो उनमें मगन हो गए हैं। कोई बच्चा, कोई खिलौना उठा रहा है और हज़ार खिलौने, और हज़ार मिठाइयाँ रखी हैं। पर एक बच्चा है, जो लगातार खिड़की से बाहर को देख रहा है कि माँ कहाँ है। उसे कमरे के भीतर का कुछ चाहिये ही नहीं। और बच्चों के हाथ के खिलौने, और मिठाइयाँ और डब्बे बदल रहे हैं, वो एक दिशा से दूसरी दिशा भाग रहे हैं, कभी ये उठाते हैं, कभी वो उठाते हैं, पर ये बच्चा एकटक बस खिड़की से बाहर देख रहा है- ‘माँ के पास जाना है’। नानक कह रहे हैं, तुम इस बच्चे के साथ हो लो।
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ना वो बढ़ता है, ना वो घटता है

बोध में न कुछ अच्छा होता है, न बुरा होता है। ‘आनंद’, अच्छा लगने की अवस्था नहीं होती। इसीलिए इतनी बार कहता हूँ कि ‘आनंद मज़ा नहीं है। ‘आनंद’ अच्छा नहीं लगेगा। ‘आनंद’, ध्यान से अगर देखो, तो बस अनुपस्थिति है, अच्छे लगने की भी और बुरे लगने की भी। और चूँकि वही शुन्यता, वही खालीपन तुम्हारा स्वभाव है, इसीलिए मन, ‘आनंद’ की अवस्था में पीड़ा नहीं अनुभव करता।
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अष्टावक्र-जनक महासंवाद
आचार्य प्रशांत के साथ 6 अप्रैल से

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मन की दौड़ ही मन का बंधन है

‘मन का होना ही एक दौड़ है’ और व्यर्थ ही नहीं दौड़ रहा, उसे वास्तव में पहुंचना है; वो बेचैन है, उसकी बेचैनी झूठी नहीं है लेकिन मन का दौड़ना वैसा ही है, जैसे कोई इस कमरे के भीतर-भीतर दौड़ता रहे और उम्मीद उसने ये बाँध रखी हो कि वो कहीं पहुँच जाएगा। उसकी कोशिशों में कमी नहीं है, बस उसके पास डर है, दीवारें हैं और श्रद्धाहीनता है। खूब दौड़ता है, खूब मेहनत करता है; श्रमिक है मन लेकिन ये हिम्मत नहीं कर पाता है कि तोड़ ही दे दीवारें।
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हिमालय की गोद में 30वें अद्वैत बोध शिविर का आयोजन किया जाने वाला है।
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में रहने का और दुनिया भर के दुर्लभ ग्रंथों के अध्ययन के इस सुनहरे अवसर को न गवाएं।

तिथि: 24-27 मार्च
स्थान: टाइगर ग्रूव रिसोर्ट, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क रामनगर(उत्तराखंड)

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