संशय, प्रमाद और आलस क्यों हावी होते हैं? || आचार्य प्रशांत, पतंजलि योगसूत्र पर (2019)

अहम को हमेशा जुड़ने के लिये कोई चाहिये।

तो अहम को शान्ति देने का, लय देने का यही तरीका है कि – उसे सही वस्तु के साथ जोड़ दो।

और कोई तरीका नहीं है।

जुड़ेगा तो वो है ही, निश्चित रूप से जुड़ेगा।

अकेला वो नहीं रह सकता।

वो प्रतिपल किसी-न-किसी व्यक्ति, वस्तु, विचार के साथ जुड़ा ही हुआ है।

जब उसे जुड़ना ही है, तो उसे सही संगति दो न।

कल्पनाएँ ही आलस्य हैं

मन के भागने को ये मत समझ लेना कि वो कुछ पाने जा रहा है कहीं। मन हमेशा, कुछ छोड़ के कहीं और जा रहा होता है। देखो, जाने के दो तरीके होते हैं ना? घर से निकले हो, तो एक तो ये कि मैं बाज़ार से कुछ लेने जा रहा हूँ, मुझे कुछ पाने जाना है कहीं। और दूसरा तरीका क्या होता है, कि घर से लड़ाई हो गयी तो मैं घर छोड़ के जा रहा हूँ। मैं कहीं को नहीं जा रहा, मैं बस घर छोड़ के जा रहा हूँ। ये दो तरीके होते हैं ना? घर से निकलने के।

मन हमेशा दूसरे तरीके से निकलता है, घर से। भ्रम ये होता है कि कुछ पाने जा रहा है। तुम्हें, भ्रम ये होता है कि मन कहीं जा रहा है। तो वो कुछ पायेगा, उसको तुम इच्छाओं का नाम देते हो, कि इच्छाएँ हैं, इसलिए उधर को दौड़ रहा है। नहीं। इच्छाएं भ्रम हैं। मन सिर्फ दौड़ इसीलिए दौड़ रहा होता है, क्योंकि जो रिएलिटी है, वास्तविकता है, उसमें नहीं जीना चाहते। और वो भी तुम्हारी ट्रेनिंग दे दी गयी है। ऐसा नहीं है कि छोटा बच्चा नहीं जीना चाहता या कि एक इंटेलीजेंट आदमी नहीं जीना चाहता। तुम नहीं जीना चाहते क्योंकि तुम्हारी ट्रेनिंग थोड़ी सी गलत हो गयी है।

आचार्य प्रशांत
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