अपनी आदतों के सिवा मैं कुछ और नहीं

आदतें जानते हो आप, जो कुछ भी जानकारी के दायरे में आता है, अतीत से आता है, जो भी आप जानते हो और बार-बार करना चाहते हो, जो बार दोहराना चाहते हो, जिसमें मन को सुरक्षा की भावना मिलती है – वो आदत है। मन कहता है, ‘’मैं एक राह पर चल रहा था पिछले 20 सालों से और मेरा कुछ ख़ास बिगड़ नहीं गया , तो अब मैं इसी राह पर और 20 साल चल लेता हूँ। जब आज तक नहीं कुछ हुआ तो अब क्या होगा’’ – यही आदत है। और मैं हूँ कौन? उससे राह पर चलने वाला।
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प्रेम और आकर्षण

आप तीस-चालीस साल किसी भी चीज़ के साथ रहो, आपको आदत पड़ जाएगी। आप एक छड़ी के साथ रहो, तो आप बिछुड़ नहीं पाओगे। आप एक जानवर के साथ तीस साल रहो, आपको आदत पड़ जाएगी। आप एक मोटर कार तीस साल चलाओ, आपसे वो बेची नहीं जाएगी – ये प्रेम नहीं है। और अक्सर जो पुराने लोग होते हैं, थोड़े उम्र दराज़, वो आज कल के लोगों को यही कहते हैं कि तुम्हारा प्यार क्या है? तुम्हारा प्यार सिर्फ़ शारीरिक आकर्षण है। ”मुझको देखो, अपनी दादी को देखो, हम में कोई शारीरिक आकर्षण नहीं, फिर भी हम कितने जुड़े हुए हैं।” उनकी बात यहाँ तक तो ठीक थी कि जवान आदमी का जो प्यार है, वो क्या है? शारीरिक आकर्षण। लेकिन वो भूल गए कि अगर जवान आदमी के पास प्रेम नहीं है, तो प्रेम तुम्हारे पास भी नहीं है। वो जुड़ा है शरीर के वशीभूत होकर और तुम जुड़े हो आदत के वशीभूत होकर।
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ईमानदारी, सत्य, पूर्णता

तुमने कोई चीज़ चुराई है और तुम्हें पता है कि छिंन तो जानी ही है। पुलिस वाला आएगा और मार पीट के ले जाएगा, तो उसको हम हर समय छुपाए-छुपाए फिरते हो।यही पोज़ेसिवनेस है – किसी ऐसी चीज़ पर दावा करना जो तुम्हारी है नहीं।तो उसमें दो चीज़े दिखाई देंगी: पहला तुम उसे पकड़े-पकड़े घूमोगे।दूसरा तुम्हें डर लगा रहेगा कि कोई आ कर इसे छीन ले जाएगा।
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न चिंता न चाहत, स्वभाव तुम्हारा है बादशाहत

ये जो मुंह का लटकाना है, इसको समझलो ये सज़ा है। कोई न कोई तो रहा होगा जिसने प्रेम से समझाया होगा। कहीं से तो आवाज़ आई होगी कि “मान जाओ। ” जब नहीं माने, करली अपनी, तो फिर मिलती है सज़ा। और उससे बच तो पाते नहीं। कोई व्यक्ति मारता है, तो शिकायत भी कर पाते हो, परिस्थितियाँ ऐसा थपेड़ा देती हैं कि शिकायत भी नहीं कर पाते। पर उनके पंजों के निशान गाल पर ज़रूर नज़र आते हैं। अब किसके खिलाफ शिकायत दर्ज कराओगे? अब बस यही बोल पाते हो, “अरे! किसमत खराब है। मैं क्या करूँ? मेरे साथ ऐसा हो गया। ”
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तुम्हारा प्रतिरोध व्यर्थ है

थोड़ा तो गौर करो, कि तुम्हारी नियति क्या है। वही हो, वहीं से आए हो, वहीं को वापस जाना है। तो क्यों अपने ही रास्ते की बाधा बनते हो, क्यों जलने से इनकार करते हो? जिधर जाना है अंततः, उधर चले ही जाओ। जो तुम हो, उसी में वापस समा जाओ। नहीं। लेकिन, रूप ले लेने का, आकार ले लेने का, माया का खेल ही यही है कि एक बार रूप ले लिया, तो उसके बाद अरूप हो जाने में भय लगता है। भले ही सारे रूप अरूप से ही जन्मते हो लेकिन रूप को दुबारा अरूप हो जाने में बड़ा भय लगता है।
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दुःख तुमने कोशिश कर करके अर्जित किया है

यही तो बीमारी है न कि तुम अपना स्वभाव भूल गये और अपने स्वभाव से हट कर तुमने कुछ और करना शुरू कर दिया, इसी का नाम तो बीमारी होता है। जो काम हर बीसवें दिन होना था, तुमने हर दूसरे दिन शुरू कर दिया, यही कैंसर है, यही हमारी आध्यात्मिक बीमारी है। पाने की लालसा इतनी ज़्यादा है कि पाने से दूर छिटकते जाते हो। देखो, तुम्हारा जो पूरा जैविक यंत्र है, ये शरीर, ये लगातार अपने विस्तार, अपने उन्नयन, अपने कोन्टीन्युएस की कोशिश कर ही रहा है। वही कोशिश जब श्रद्धाहीन हो जाती है, जब बावरी हो जाती है, तो कैंसर कहलाती है।
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