ईमानदारी, सत्य, पूर्णता

तुमने कोई चीज़ चुराई है और तुम्हें पता है कि छिंन तो जानी ही है। पुलिस वाला आएगा और मार पीट के ले जाएगा, तो उसको हम हर समय छुपाए-छुपाए फिरते हो।यही पोज़ेसिवनेस है – किसी ऐसी चीज़ पर दावा करना जो तुम्हारी है नहीं।तो उसमें दो चीज़े दिखाई देंगी: पहला तुम उसे पकड़े-पकड़े घूमोगे।दूसरा तुम्हें डर लगा रहेगा कि कोई आ कर इसे छीन ले जाएगा।
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आचार्य प्रशांत से जुड़ने के माध्यम

1.) अद्वैत बोध शिविर
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संपर्क करें: श्री अंशु शर्मा: +91 – 8376055661

2.) आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स
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3.) बोधसत्र का सीधा ऑनलाइन प्रसारण
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4.) आचार्य जी से निजी साक्षात्कार
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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न चिंता न चाहत, स्वभाव तुम्हारा है बादशाहत

ये जो मुंह का लटकाना है, इसको समझलो ये सज़ा है। कोई न कोई तो रहा होगा जिसने प्रेम से समझाया होगा। कहीं से तो आवाज़ आई होगी कि “मान जाओ। ” जब नहीं माने, करली अपनी, तो फिर मिलती है सज़ा। और उससे बच तो पाते नहीं। कोई व्यक्ति मारता है, तो शिकायत भी कर पाते हो, परिस्थितियाँ ऐसा थपेड़ा देती हैं कि शिकायत भी नहीं कर पाते। पर उनके पंजों के निशान गाल पर ज़रूर नज़र आते हैं। अब किसके खिलाफ शिकायत दर्ज कराओगे? अब बस यही बोल पाते हो, “अरे! किसमत खराब है। मैं क्या करूँ? मेरे साथ ऐसा हो गया। ”
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तुम्हारा प्रतिरोध व्यर्थ है

थोड़ा तो गौर करो, कि तुम्हारी नियति क्या है। वही हो, वहीं से आए हो, वहीं को वापस जाना है। तो क्यों अपने ही रास्ते की बाधा बनते हो, क्यों जलने से इनकार करते हो? जिधर जाना है अंततः, उधर चले ही जाओ। जो तुम हो, उसी में वापस समा जाओ। नहीं। लेकिन, रूप ले लेने का, आकार ले लेने का, माया का खेल ही यही है कि एक बार रूप ले लिया, तो उसके बाद अरूप हो जाने में भय लगता है। भले ही सारे रूप अरूप से ही जन्मते हो लेकिन रूप को दुबारा अरूप हो जाने में बड़ा भय लगता है।
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दुःख तुमने कोशिश कर करके अर्जित किया है

यही तो बीमारी है न कि तुम अपना स्वभाव भूल गये और अपने स्वभाव से हट कर तुमने कुछ और करना शुरू कर दिया, इसी का नाम तो बीमारी होता है। जो काम हर बीसवें दिन होना था, तुमने हर दूसरे दिन शुरू कर दिया, यही कैंसर है, यही हमारी आध्यात्मिक बीमारी है। पाने की लालसा इतनी ज़्यादा है कि पाने से दूर छिटकते जाते हो। देखो, तुम्हारा जो पूरा जैविक यंत्र है, ये शरीर, ये लगातार अपने विस्तार, अपने उन्नयन, अपने कोन्टीन्युएस की कोशिश कर ही रहा है। वही कोशिश जब श्रद्धाहीन हो जाती है, जब बावरी हो जाती है, तो कैंसर कहलाती है।
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आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में 31 वें अद्वैत बोध शिविर का आयोजन किया जाने वला है

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अपने अंधकार से दूसरों को कैसे रौशन कर पाओगे

प्रकाश आपके भीतर ही है, पर वो प्रकाश आपको नहीं उपलब्ध है। आपकी आँखों से पूरा जग प्रकाशित हो रहा है, पर अपना ही मन नहीं प्रकाशित हो रहा। आपको क्या लगता है कि ये रोशनी सूरज की रोशनी है ? नहीं, सूरज की रोशनी नहीं है, वो आपकी रोशनी है। मज़े की बात ये है कि आप इतने रोशन हैं कि आपकी रोशनी से सूरज चमक रहा है, और जो इतना रोशन है, उसके भीतर अँधेरा है। आपकी रोशनी से पूरी दुनिया प्रकाशित हो रही है, बस आप ही प्रकाशित नहीं हो रहे। ये पूरा संसार क्या है, ये आपका ही विस्तार है। इसे आपने ही जगमगा रखा है। बस अपनेआप को ही नहीं जगमगा रखा।
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हिमालय की गोद में 30वें अद्वैत बोध शिविर का आयोजन किया जाने वाला है।
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में रहने का और दुनिया भर के दुर्लभ ग्रंथों के अध्ययन के इस सुनहरे अवसर को न गवाएं।

तिथि: 24-27 मार्च
स्थान: टाइगर ग्रूव रिसोर्ट, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क रामनगर(उत्तराखंड)

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तुम्हारी बेवफ़ाई ही तुम्हारी समस्या है

तुम ये देखो कि तुम्हें कष्ट क्यूँ होता है समझना इस बात को। जैसे तुम कष्ट के चक्कर में फँसे हो न ठीक उसी तरह से दुसरे लोग भी फँसे हैं। जब तुम ये समझ जाओगे कि तुम कैसे फँसे तो तुम दूसरों के चक्कर भी समझ जाओगे। जब तुम ये समझ जाते हो कि कोई कैसे फँसा तो तुम्हें कष्ट से मुक्ति का रास्ता भी मिल जाता है। फिलहाल तो तुम असंभव की बात कर रहे हो। तुम कह रहे हो कि जैसे लोग हैं, जैसे ढर्रों पे वो चल रहे हैं, वो ढर्रे चलते रहे उन ढर्रों से कोई मुक्ति ना मिले लेकिन कष्ट भी साफ़ हो जाए। ऐसा हो नहीं सकता न।

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हिमालय की गोद में 30वें अद्वैत बोध शिविर का आयोजन किया जाने वाला है।
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में रहने का और दुनिया भर के दुर्लभ ग्रंथों के अध्ययन के इस सुनहरे अवसर को न गवाएं।

तिथि: 24-27 मार्च
स्थान: वी.एन.ए रिसोर्ट, ऋषिकेश

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