पुरुषार्थ या प्रारब्ध?

प्रारब्ध का अर्थ है, ‘मैं मशीन हूँ’ और मशीन का कोई माई-बाप नहीं होता| मशीन के पास चेतना ही नहीं है अपने माई-बाप जैसा कुछ सोचने की| समर्पण का अर्थ होता है, ‘मैं जान गया कि क्या यांत्रिक है, और मैं उसमें नहीं बंधूंगा, समझ गया’| यह ही समर्पण है|

किस दिशा जाऊँ?

पाने की इच्छा हीनता के भाव से निकलती है| इच्छा पूरा होना चाहती है, ख़त्म हो जाना चाहती है, जो असंभव है| कुछ भी पा कर जीवन की रिक्तता ख़त्म नहीं होती| वो जो हीन नहीं है, वो तुममे ही सोया हुआ है| उसे जगाओ, उसकी तरफ ध्यान दो|

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