दूसरों की मदद का भ्रम

यदि मेरा काम ही यही है कि मैं दूसरों की मदद करता रहूँ, मुझे अपने आप से नज़र चुरानी है और लगातार दूसरों की ओर ही देखते रहना है, एक झूठ में जीना है मुझे, तो मेरे लिए ज़रूरी हो जाता है कि मेरे आस पास ऐसे लोग बने रहें जो मेरी मदद के आकांक्षी हों। और मुझे बहुत अच्छा लगेगा जब लोग मुझसे मदद मांगने आएँगे। कई लोग बिलकुल प्रसन्न हो जाते हैं जब तुम उनके पास मदद मांगने जाओ। जो तुम्हारी मदद मांगने से खुश होता हो, जिसको इस बात में ख़ुशी मिलती हो कि कोई मेरे पास माद मांगने आया, उसको इस बात से दुःख भी होगा कि लोग अब मेरे पास मदद मांगने नहीं आ रहे।
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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अपने ऊपर भरोसा क्यों नहीं है?

बात सिर्फ़ आत्मविश्वास की नहीं है । ‘हमें विश्वास ही नहीं है । हमें किसी भी व्यक्ति पर, चीज़ पर, घटना पर, किसी भी बात के होने पर यकीन ही नहीं है । हमें यह भी ठीक-ठीक यकीन नहीं है कि हमारे पाँव-तले ज़मीन है कि नहीं है ।

यह सुनने में अतिश्योक्ति लगती है, पर बात ऐसी ही है । तुम जिन भी बातों पर बड़ा गहरा यकीन करते हो, कोई आकर, कुछ भारी और तीख़े तर्क देकर, उन सब यकीनों को हिला सकता है । तुम्हारे पास ऐसा कुछ भी नहीं है, जो जड़ से उखाड़ा न जा सकता हो ।

परिपक्वता क्या है?

प्रश्न: सर, परिपक्वता क्या है? वक्ता: (१८-२२ वर्ष की आयु के विद्यार्थियों की सभा को संबोधित करते हुए) यह शब्द ‘परिपक्वता’ हम सभी को अपने लिए महत्वपूर्ण

क्या एकाग्रता ध्यान में सहयोगी है?

प्रश्न: क्या एकाग्रता ध्यान में सहयोगी है? वक्ता: नहीं। हाँलांकि, विशिष्ट परिस्थितियों के अंतर्गत ऐसा हो सकता है। तुम्हें गुरु के पास वापस आना ही

चलना काफी है

आपने ऐसे लोग देखे होंगे जो बोलते हैं, खूब बोलते हैं, और मौन आते ही असहज हो जाते हैं, बड़े बेचैन से हो जाते हैं। अगर वो आपके साथ बैठे हैं, और बीच में एक मिनट का भी मौन आ जाए, तो इनके लिए मौन झेल पाना बड़ा मुश्किल होता है। क्योकि, शब्दों में हमारा झूट छिपा रहता है। मौन मे तो मन का सारा तथ्य उद्घाटिक होने लगता है। मौन नहीं झेल पाएंगे।

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