कुछ बच्चे इतना डरते क्यों हैं? || आचार्य प्रशांत (2018)

नुकसान व्यर्थ चीज़ नहीं होती।

नुकसान के लाभ हैं। 

नुकसान न हुआ होता, तो और बड़ा नुकसान हो जाता, इसीलिये नुकसान भली बात है।

हर नुकसान छोटा है, क्योंकि उसके आगे और बड़ा नुकसान  है।

जब भी नुकसान हो, और धन्यवाद दो।

मन के मते न चालिए || आचार्य प्रशांत, छात्रों के संग (2015)

कभी भी इस तर्क को महत्त्व मत देना कि – भई, अपनी-अपनी मर्ज़ी होती है। अपनी मर्ज़ी, ‘अपनी’ होती ही नहीं।

लाखों में कोई एक होता है, जिसकी अपनी मर्ज़ी होती है।

२६वां अद्वैत बोध शिविर, शिवपुरी

आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में आयोजित बोध शिविर विरल एवं उल्लासपूर्ण अनुभव होते हैं, जिनमें मन को संतों, शास्त्रों, प्रकृति, और स्वयं के निकट आने का अनन्य अवसर मिलता है। हिमालय की गोद में अब तक पच्चीस शिविरों का आयोजन किया जा चुका है।
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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मान ही लिया है या जानते भी हो?

सुबह से लेकर शाम तक 24 घंटे जीवन को देखो तब समझ आ जाएगा कि, जागृति कितनी है। इस देखने को ही कहते हैं जानना। अपनी आँखों से ज़िन्दगी को देखो और फिर जो दिखाई दे उसको अस्वीकार मत कर दो। ये मत कह दो कि जो दिख रहा है उसको हम देखना नहीं चाहते। और मैं तुमसे पक्का कह रहा हूँ जो तुम्हें दिखाई देगा वो शायद तुम्हें भला ना लगे। तुम्हें दिखाई देगा कि जिनको तुमने अपना आदर्श माना था वो बौने हैं, तुमको दिखाई देगा कि तुम जिन रास्तों पर चल रहे थे उन पर काँटों और दुःख के अलावा और कुछ नहीं है। तो इसी लिए हम जब देखते भी हैं तो, जल्दी से आँखें बंद भी कर लेते हैं क्यूँकी जो दिख रहा होता है वो बड़ा असहनीय होता है। जैसे कोई आईना देखे और उसे अपनी शक्ल बड़ी कुरूप दिखाई दे। तो वो क्या करेगा जल्दी से अपनी आँखें ही बंद कर लेगा कम से कम अब वो कल्पनाओं में ये मान तो सकता है न कि मैं सुन्दर हूँ। आँख बंद कर लो।

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क्षमा माने क्या?

गौर से देखिए क्या होता है, किसी से आपको कुछ मिला आप कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं| आप कहते हैं, धन्यवाद| धन्यवाद कहकर आप सिद्ध क्या कर रहे है? कि पहले नहीं मिला हुआ था| अब धन्यवाद एक घटना बन गयी है, मनोस्थिति नहीं रही आपकी और यही दुःख है, यही पीड़ा है|
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कबीर के वचनों को समझने का प्रयत्न मानवता ने बारम्बार किया है। किन्तु संत को समझने के लिए कुछ संत जैसा होना प्रथम एवं एकमात्र अनिवार्यता है। संत जो कहते हैं उनके अर्थ दो तलों पे होते हैं – शाब्दिक एवं आत्मिक। समाज ने कबीर के वचनों के शाब्दिक अर्थ कर, सदा उन्हें अपने ही तल पर खींचने का प्रयास किया है, आत्मिक अर्थों तक पहुँच पाना उसके लिए दुर्गम प्रतीत होता है। आचार्य प्रशांत ने उन वचनों के आत्मिक अर्थों का रहस्योद्घाटन कर कुछ ऐसे मोती मानवता के समक्ष प्रस्तुत किये हैं जो जीवन की आधारशिला हैं। आज की परिस्थिति में जीवन को सरल एवं सहज भाव में व्यतीत कर पाने का साहस, आचार्य जी के शब्दों से मिलता है।

कबीर, जो सदा सत्य के लिए समर्पित रहे, उनके वचनों के गूढ़ एवं आत्मिक अर्थों से अनभिज्ञ रह जाना वास्तविक जीवन के मिठास से अपरिचित रह जाने के सामान है, कृपा को उपलब्ध न होने के सामान है।

प्रौद्योगिकी युग में थपेड़े खाते हुए मनुष्य के उलझे जीवन के लिए ये पुस्तक प्रकाश स्वरुप है।

गगन दमदमा बाजिया :
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२४वां अद्वैत बोध-शिविर, मुक्तेश्वर

एक अद्भुत अवसर आपका इंतज़ार कर रहा है….

आचार्य जी के जादुई प्रवचनों के करीब होने का और चार निर्बाध दिनों के लिए अपने ढर्रों से मुक्त होने का

आचार्य जी द्वारा चयनित ग्रंथों का पाठ करने और सत्रों के माध्यम से संतों और शास्त्रों के करीब आने का

हिमालय की गोद में प्रकृति के बीच होने का

विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से अपने जीवन को और बारीकी से देखने व समझने का

आवेदन आमंत्रित हैं

तिथि: १२ से १५ सितम्बर, २०१६

स्थान: मुक्तेश्वर, उत्तराखंड

अपने आवेदन requests@prashantadvait.com पर भेजें
आवेदन भेजने की अंतिम तिथि – ११ सितम्बर

अन्य जानकारी हेतु संपर्क करें:
Mr. Kundan Singh: 09999102998
या लिखें: kundan@prashantadvait.com

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