बाहरी प्रेरणा साथ नहीं देती

बाहरी आता है, एक माहौल बनाता है, तुम्हारे मन को बिलकुल आंदोलित कर देता है l उसके रहते मन आंदोलित होता है पर क्या ऐसा उत्साह सदा रह सकता है? प्रभाव जाएगा और उसके साथ तुम्हारा उत्साह भी चला जाता है l

और क्या जीवन हमने ऐसे ही नहीं बिताया है ?

शरीर यन्त्र है, तुम नहीं

क्या तुम्हारे साथ ऐसा नहीं होता कि सिर दर्द हो रहा है पर तुम कहो कि सिर को दर्द होने दो, हम नहीं रुकेंगे? शरीर को मशीन की भाँति लगे रहने दो। तुम मशीन मत बन जाना।

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