‘मैं’ भाव क्या है? मैं को कैसे देखें?||आचार्य प्रशांत(2019)

जब भीतर से आकुलता ही नहीं उठ रही, न अज्ञान की तड़प है, न मुक्ति छटपटाहट है, तो क्या बताएँ कि अध्यात्म क्या है।

फिर तो यही सब है – इधर-उधर की बातें – कि रुद्राक्ष कितनी पहनने होते हैं, चार्जड पानी पीकर क्या होता है, यही सब अध्यात्म है फिर।

जब इस तरह का मनोरंजक अध्यात्म हो जाये आपका, तो जान लीजिये मुक्ति नहीं चाहिये, मनोरंजन चाहिये।

मृत्यु के बाद क्या होता है? || आचार्य प्रशांत (2019)

तुम ही संसार हो।

जिस पल तुम नष्ट हुए, उस पल तुम्हारे लिए संसार और समय दोनों नष्ट हो जाते हैं। वास्तव में ये प्रश्न बेतुका है कि मृत्यु के बाद क्या बचेगा।

जब कोई पूछे कि मृत्यु के बाद क्या बचेगा, तो पूछो,”कहाँ?” क्योंकि तुम मरे तो, संसार मरा।

तो अब कुछ बचेगा भी, तो कहाँ बचेगा?

गुरु और सद्गुरु में क्या अंतर है?

संसार का मतलब ही है कि वहाँ तुम्हें कोटियाँ मिलेंगी, वर्ग मिलेंगे, और विभाजन मिलेंगे।

परमात्मा के दरबार में न श्रेणियाँ हैं, न वर्ग हैं, न विभाजन हैं। वहाँ दो ही नहीं हैं, तो बहुत सारे कैसे होंगे?

दुनिया में बहुत सारी चीज़ें हैं। दुनिया में तुम कहोगे कि फलाने दफ़्तर में एक नीचे का कर्मचारी है, फ़िर उससे ऊपर का, फ़िर उससे ऊपर का, फ़िर उससे ऊपर का।

‘वहाँ’ ऊपर दो नहीं होते, ‘वहाँ’ एक है।

मन के मते न चालिए || आचार्य प्रशांत, छात्रों के संग (2015)

कभी भी इस तर्क को महत्त्व मत देना कि – भई, अपनी-अपनी मर्ज़ी होती है। अपनी मर्ज़ी, ‘अपनी’ होती ही नहीं।

लाखों में कोई एक होता है, जिसकी अपनी मर्ज़ी होती है।

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