‘मैं’ भाव क्या है? मैं को कैसे देखें?||आचार्य प्रशांत(2019)

कभी ऐसा होता कि ‘मैं’ बिना किसी से जुड़े भी अलग पाया गया होता, तो हम ‘मैं’ के पृथक और स्वतंत्र अस्तित्व की बात कर पाते।

पर जब वो कभी स्वतंत्र पाया ही नहीं जाता, तो ‘मेँ माने क्या?

कुछ नहीं।

‘मैं’ माने फिर वो, जिसके साथ ‘मैं’ सम्बन्धित है।

मृत्यु के बाद क्या होता है? || आचार्य प्रशांत (2019)

तुम ही संसार हो।

जिस पल तुम नष्ट हुए, उस पल तुम्हारे लिए संसार और समय दोनों नष्ट हो जाते हैं।

तो अध्यात्म जब कहता है, “स्वयं को जानो,” तो सुनने में बड़ी छोटी-सी बात लगती है, पर बड़ी दूरगामी है।

स्वयं को नहीं जाना, तो दुनिया भर के व्यर्थ लफड़ों-पचड़ों में फंसे रहोगे, और इधर-उधर की बात करते रहोगे।

गुरु और सद्गुरु में क्या अंतर है? || आचार्य प्रशांत (2019)

संसार का मतलब ही है कि वहाँ तुम्हें कोटियाँ मिलेंगी, वर्ग मिलेंगे, और विभाजन मिलेंगे।

परमात्मा के दरबार में न श्रेणियाँ हैं, न वर्ग हैं, न विभाजन हैं।

वहाँ ‘दो’ ही नहीं हैं, तो बहुत सारे कैसे होंगे?

दुनिया में बहुत सारी चीज़ें हैं।

दुनिया में तुम कहोगे कि फलाने दफ़्तर में एक नीचे का कर्मचारी है, फ़िर उससे ऊपर का, फ़िर उससे ऊपर का, फ़िर उससे ऊपर का।

‘वहाँ’ ऊपर दो नहीं होते, ‘वहाँ’ एक है।

आत्मा और जगत का क्या सम्बन्ध है? || आचार्य प्रशांत (2018)

एक तो आत्मा आवश्यक है।

और दूसरे, आत्मा के चलते ही, जगत की निस्सारता भी आवश्यक है।

इसीलिए ज्ञानी ये भी जानते हैं कि आत्मा मात्र है, जगत मिथ्या।

और अन्यत्र वो ये भी कहते हैं कि जगत कुछ नहीं है, आत्मा का ही प्रतिपादन है।

शरीर, मन, आत्मा || आचार्य प्रशान्त (2016)

आध्यात्मिकता का अंत होता है ऐसे अनुग्रह के भाव पर, जहाँ शिकायतें बचती नहीं।

पर आध्यात्मिकता की शुरुआत होती है बड़ी गहरी शिकायत से।

जिनके पास शिकायत नहीं, उनके लिए आध्यात्मिकता नहीं।

यदि ईश्वर सबकी सभी माँगें पूरी कर दें तो क्या होगा? || (आचार्य प्रशांत, 2018)

ईश्वर और जीव अलग-अलग हैं ; द्वैत हैं, कामनाजन्य हैं।

ब्रह्म और आत्मा एक हैं ;अद्वैत हैं, निष्काम हैं।

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