गिरना शुभ क्योंकि चोट बुलावा है

सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि। मुनेर्जानत आश्चर्यं ममत्वमनुवर्तते॥ – अष्टावक्र गीता(३.५) वक्ता: जब उस योगी ने जान ही लिया है कि वही समस्त भूतों में निवास

चलना काफी है

आपने ऐसे लोग देखे होंगे जो बोलते हैं, खूब बोलते हैं, और मौन आते ही असहज हो जाते हैं, बड़े बेचैन से हो जाते हैं। अगर वो आपके साथ बैठे हैं, और बीच में एक मिनट का भी मौन आ जाए, तो इनके लिए मौन झेल पाना बड़ा मुश्किल होता है। क्योकि, शब्दों में हमारा झूट छिपा रहता है। मौन मे तो मन का सारा तथ्य उद्घाटिक होने लगता है। मौन नहीं झेल पाएंगे।

प्रशंसा – स्वास्थ्य का भ्रम

निंदक मेरा जनि मरु, जीवो आदि जुगादि ।  कबीर सतगुरु पाइये, निंदक के परसादि ॥ वक्ता: स्वास्थ्य स्वभाव है और स्वस्थ होने का मतलब होता

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