ज़िम्मेदारी का भ्रम

असली जिम्मेदारी कर्तव्यों का निर्वाह नहीं अपितु बोधपूर्ण होना है। बोध है उचित काम कर पाने की क्षमता। बोध में जिम्मेदारिओं का निर्वाह स्वतः ही होता है, प्रेमपूर्वक, और उसमें किसी प्रकार के बोझ का भाव नहीं होता। जो बोधपूर्ण नहीं है, जिम्मेदारियों की समझ उसे नहीं हो सकती, वो हमेशा कर्तव्यों के बोझ तले दबा ही रहेगा।

आत्म-ज्ञान ही आत्म-सम्मान

‘सम्मान’ का मतलब बस मान लेना नहीं है कि बस मान लिया, आँख बंद करके। फिर तो सिर्फ ‘मान’ भी लिखा जा सकता था, जैसे मान-अपमान होता है ।

‘सम्मान’ का अर्थ है ठीक तरीके से मानना, ठीक तरीके से मानने का अर्थ है पहले जानना-फिर मानना। “जानूँगा तभी मानूँगा”।

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