श्रद्धा क्या है? आत्मविश्वास से श्रद्धा का क्या संबंध है? || आचार्य प्रशांत, तत्वबोध पर (2019)

तुम्हें पता होना चाहिये कि तुम्हारा हित कहाँ है।

तुम्हें दिखना चाहिये कि ये चिकित्सक तुम्हारे साथ जो कुछ भी कर रहा है, उसी में तुम्हारा फायदा है। और अगर तुम भागोगे, तो नुकसान अपना ही करोगे।

यही चीज़ तुमको अडिग रख सकती है, गुरु के पास।

और कुछ नहीं।

संकोच माने क्या? || आचार्य प्रशांत, छात्रों के संग (2013)

संकोच का उल्टा अर्थ मत निकाल लेना। कोई संकोच नहीं करता इसका अर्थ यह नहीं है कि वो पूरा मनमौजी हो गया है, निरंकुश हो गया है। ‘संकोच नहीं है’ इसकी एक ही जायज़ वजह हो सकती है — स्पष्टता।

स्पष्टता में अगर शांत भी बैठे हो तो बढ़िया। हम संकोच न होने का आमतौर पर यह अर्थ निकालते हैं कि यह बिंदास है, कुछ भी जाकर बोल आता है। यह अधूरी बात है, आधी बात है। जो संकोच नहीं करता वो चुप रहने में भी संकोच नहीं करता — यह पूरी बात हुई। वो बोलने में भी संकोच नहीं करता और चुप रहने में भी। तो कभी तुम चुप रह जाओ तो अपनेआप को अपराधी मत समझ लेना। मौन बड़ी बात है और कई बार शब्दों से ज़्यादा कीमती होता है मौन।

मुझे क्या पाने की ज़रूरत है?

‘जिनको कुछ ना चाहिए’ का मतलब ये नहीं है की इच्छाएं कहीं मर गई। उनका मतलब ही यही है कि इच्छाएं आती-जाती रहेंगी। सारी इच्छाएं जिसको पाने के लिए है, हम उसको जान गए हैं। आपकी कोई भी इच्छा है — आपने कहा ना ख़ुशी के लिए है — हम उस ख़ुशी को जान गए हैं।
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भक्ति योग एवं पुरुषोत्तम योग आचार्य प्रशांत के साथ
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जब चाहो तब मुक्ति

आप किसी भी तल पर पहुँच गए हों, वहां से एक रास्ता हमेशा उपलब्ध होता है लौटने का, हमेशा। अन्यथा फिर वो भूलभुलैया नहीं है, फिर वो लीला नहीं हो सकती, फिर वो खेल नहीं हो सकता। खेल का तो अर्थ ही यही है: जिसमें अभी आपको थोड़ी सम्भावना दी गई है जीतने की, आप जीत सकते हो। ठीक है अभी आप हार रहे हो, लेकिन खेल अभी पूरा नहीं हुआ। जब तक खेल पूरा नहीं होता, तब तक जीतने की सम्भावना है, और फिर वो अभी खेल नहीं है। आप कितना भी फंसे हुए हो, आपके सामने रास्ता एक खुला होता है — बड़ी कृपा है — इसी को अनुकम्पा कहते हैं। भूलभुलैया के किसी भी तल पर जा कर के आप गिरे हो, कितनी भी आपने अपनी दुर्दशा कर ली है, लेकिन फिर भी मुक्ति का मार्ग कभी पूर्णतया बंद नहीं होता।
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29वां अद्वैत बोध शिविर
24 से 27 फरवरी, शिवपुरी, ऋषिकेश
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विनाश की ओर उन्मुख शिक्षा

जो जितना शिक्षित है, वो उतना बर्बर है; यही तुम्हारी शिक्षा है क्यूँकी शिक्षा का जो मूलभूत ढांचा है, वही झूठा है। बचपन से तुम्हें क्या पढ़ा दिया गया है? बचपन से तुम्हें यही सिखाया गया है कि गणित पढ़ लो, भाषाएँ पढ़ लो, हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत पढ़ लो। तुमसे कहा गया है कि इतिहास पढ़ लो पर तुम इतिहास नहीं हो। तुम जो हो, वो तुमको कभी कहा नहीं गया। तुमसे कहा भी नहीं गया कि क्षण भर को रुक कर के अपने आप को भी तो देख लो तो इसीलिए इस अंधी शिक्षा व्यवस्था से जो आदमी निकलता है, तो वैसा ही होता है।
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सरलतम व श्रेष्ठतम मन ही आध्यात्मिक हो सकता है

एक सामान्य आदमी तो फिर भी शायद कभी जगे पर ये लोग जो प्रोफेशनल कहलाते है समाज में और थोड़ा पैसा भी कम लेते हैं, इन लोगों का जगना तो असंभव है क्योंकि इनके सामने इनकी उपलब्धियां ही बाधा बन जाएंगी, वो कहेंगे कि इन्हें छोड़ें कैसे और ये माने कैसे कि हमने जो आज तक करा वो फिज़ूल था। ये मानने में बड़ा कष्ट है कि, “जीवन व्यर्थ गया, ज़िन्दगी बेवकूफी में काट दी, ये हम नहीं मान सकते।” ये मान लिया तो अहंकार बिलकुल टूट जाएगा।
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