पक्षी, आकाश, नदी, और तुम

रविवार सुबह को बोधपूर्ण बिताने का एक बेहतरीन मौका !
——————————————————————

आप आमंत्रित हैं इस रविवार 15 नवम्बर, श्री प्रशांत के व्याख्यान में:

विषय: धर्म क्या है?
स्थान: महर्षि रमण केंद्र, लोधी रोड, नयी दिल्ली
समय: 9:45 am
वक्ता: श्री प्रशांत (http://www.advait.org.in/shri-prashant.html, http://hindi.prashantadvait.com/about/)
आयोजक एवं संपर्क: 09910685048

धर्म-सम्बंधित अपने प्रश्नों के समाधान के लिए ज़रूर आयें| अन्य उत्सुक जनों को भी साथ लायें, सबका स्वागत है |

‘यहाँ’ से बेहतर कोई जगह नहीं

कमी हमेशा तुलना के फ़लस्वरूप आती है।

तुमसे पुछा जाये कि प्रशांत महासागर में पानी कितना है? तो तुम कहोगे “बहुत सारा।”
तुमसे पुछा जाये कि “भारतीय महासागर में पानी कितना है”? तुम कहोगे, “बहुत सारा”।

मैं कहूँगा, “दोनों में से ज़्यादा पानी किसमें है?” तो तुम कहोगे “पहले वाले में ‘ज़्यादा’ है और दूसरे में ‘कम’ है।” अब दूसरे में कम कैसे हो गया?

और किसको ‘कम’ बोल रहे हो ?

(हँसते हुए) तुम एक महासागर को ‘कम’ बोल रहे हो क्योंकि तुमने उसकी तुलना कर दी। अब महासागर भी ‘कम’ हो गया!

तुलना मत करो, तो कोई कमी नहीं हुई है। जो हुआ है वही होना था।

भ्रांत कौन, और किसके लिए?

अंतर्विकल्पशून्यस्य बहिः स्वच्छन्दचारिणः। भ्रान्तस्येव दशास्तास्तास्-तादृशा एव जानते॥ – अष्टावक्र गीता (१४- ४) अनुवाद : भीतर से निर्विकल्प और बाहर से स्वच्छंद आवरण वाले, प्रायः भ्रांत

मेरा असली स्वभाव क्या है?

कुत्रापि खेद: कायस्य जिह्वा कुत्रापि खेद्यते।  मन: कुत्रापि तत्त्यक्त्वा पुरुषार्थे स्थित: सुखम्।।  ~ अष्टावक्र गीता(१३.२)  अनुवाद: शारीरिक दुःख भी कहाँ है, वाणी के दुःख भी

1 2 3 4 5 6