आत्मा कहाँ है?

दिक्कत क्या हुई है कि दुनिया के सारे धर्म-ग्रन्थ ऐसे लोगों के हाथों में पड़ गए है, जो उनको पढ़ने के अधिकारी ही नहीं थे। उन्होंने उनको न सिर्फ पढ़ा है बल्कि उन पर भाष्य भी लिख दिए हैं। और ये भी दावा कर दिया है कि, ‘’हम विशेषज्ञ हैं, हमसे पूछो कि इनका अर्थ क्या है।’’ तो ज़बरदस्त अनर्थ हुए हैं। हर धर्म में ज़बरदस्त अनर्थ हुए हैं! एक-एक पंक्ति, नाश उसका लगा दिया गया है। बात वो कुछ और इशारा कर रही है। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि एक पंक्ति नहीं है जिसका अर्थ वास्तव में लिया जाता हो, जो कहने वाले ने कहना चाहा था। क्योंकि अर्थ आप तभी समझ सकते हो, जब आप वहीं स्थित हो, जाओ जहाँ से वो पंक्ति आ रही है।
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गगन घटा गहरानी रे

जब कबीर खेत की बात कर रहे हैं, तो वहाँ पर कृष्ण का ध्यान आ जाना स्वभाविक है, जहाँ उन्होंने क्षेत्र-क्षेत्र के विभाग वियोग में यही बात की है। कबीर ने खेत की और अवधूत की छवि ली है, और करीब-करीब ये ही कृष्ण ने भी ली है। तुम क्षेत्रज्ञ हो, और संसार तुम्हारा क्षेत्र है। वही यहाँ पर कबीर छवि उठा रहे हैं। जो अच्छा किसान होता है, वो अपनी फसल कांट करके घर ला पाता है। और जो नहीं होता, लापरवाह होता है, उसका यही होता है कि कभी पानी, वर्षा उसका खेत तबाह करती है, कभी जानवर आकर के उसका खेत चर जाते हैं। अंततः उसके हाथ कुछ नहीं लगता। वो यही पाता है कि जन्म वृथा गंवाया। ‘जन्म वृथा गंवाया।’ फसल हो सकती थी, लाभ हो सकता था, परम की प्राप्ति उसको हो सकती थी, पर हुआ कुछ नहीं। मेहनत भी करी, पर लापरवाही खूब रही, बोध नहीं रहा। चार जो रखवाले थे, वो उसको उपलब्ध नहीं थे, या जो उसने उसमें फसल बोई, वो “नाम” की धानी नहीं थी, उसने कुछ और ही बो दिया उसमें। इधर- उधर की झाड़ , पतवार बो दी। तो अंततः कोई लाभ नहीं मिला।
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भक्ति का आधार क्या है?

भक्ति बड़ी ईमानदारी के बिंदु से शुरू होती है। भक्ति कहती है कि, ‘’’वो’ जो कुछ है, उसके विषय में मुझे जो कुछ कहा गया है, और उसके विषय में जो भी मुझे झलकें मिलती हैं, उनके आधार पर इतना तय है कि मैं अपने आपको जो मानता हूँ, मुझसे वो सर्वथा भिन्न है। जब वो मुझसे इतना भिन्न है तो उचित यही है कि मैं उसे ‘तू’ कहूँ। मैं उसे ‘मैं’ नहीं कह सकता अभी, अभी तो नहीं ही कह सकता। इतने अलग- अलग हैं हम, मैं उसे कैसे कह दूँ ‘मैं’? नहीं कहूँगा, मैं नहीं कहूँगा; ‘तुम’ ही कहूँगा। ‘तुम’, ‘मैं’ उस दिन बनेगा, जिस दिन मैं उसके जैसा हो जाऊंगा और उसके जैसा होने का मतलब है कि अभी मैं जैसा हूँ जब ये विगलित हो जाएगा। तब मैं कहूँगा कि मैं और तू एक हुए। तब तक तो मेरी इतनी हैसियत नहीं, दुस्साहस होगा। तो मुझे तू ही कहने दो, यही भक्ति का आधार है। कि तू कहूँगा, मैं नहीं कहूँगा। ज्ञानी क्या कहता है? वो शुरू से ही ‘मैं’ कहता है; भक्त ‘मैं’ कहता ही नहीं, भक्त ‘तू’ कहता है।
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बोध में स्मृति का क्या स्थान है?

जैसे अनंत विस्तार का कोई केंद्र नहीं हो सकता न। कुछ सीमित है, तो उसका केंद्र बना सकते हो। अनंतता का, इन्फिनिटी का कोई केंद्र नहीं हो सकता। तो यह संभव है कि मन रहे पर मन का कोई केंद्र न रहे। यह बिलकुल संभव है। तब स्मृतियाँ रहेंगी, यादें रहेंगी पर कोई केंद्र नहीं होगा जहाँ से याद कर रहे हो।
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आप सभी आमंत्रित हैं:

‘स्पिरिचुअल हीलिंग’ पर आचार्य प्रशांत द्वारा शब्द योग सत्र में।

दिनांक: बुधवार, 26.10.2016

समय: 6:30 p.m से

स्थान: तीसरी मंजिल,G-39, सेक्टर-63 , नॉएडा
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असली आज़ादी है आत्मा

शरीर भर है जिसे पूरी तरह बाँधा जा सकता है। मन पर सीमा लगाने की कोशिश की जा सकती है पर वह बहुत सफल होगी नहीं और आत्मा पर तो वह कोशिश भी नहीं की जा सकती।

तो इंसान है जो बाँधने की कोशिश करता है और वह भी उसी हद तक जिस हद तक तुम्हारा आचरण है।

अब एक इंसान दूसरे इंसान के आचरण को बाँधने की कोशिश कर रहा है।

पक्षी, आकाश, नदी, और तुम

रविवार सुबह को बोधपूर्ण बिताने का एक बेहतरीन मौका !
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आप आमंत्रित हैं इस रविवार 15 नवम्बर, श्री प्रशांत के व्याख्यान में:

विषय: धर्म क्या है?
स्थान: महर्षि रमण केंद्र, लोधी रोड, नयी दिल्ली
समय: 9:45 am
वक्ता: श्री प्रशांत (http://www.advait.org.in/shri-prashant.html, http://hindi.prashantadvait.com/about/)
आयोजक एवं संपर्क: 09910685048

धर्म-सम्बंधित अपने प्रश्नों के समाधान के लिए ज़रूर आयें| अन्य उत्सुक जनों को भी साथ लायें, सबका स्वागत है |

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