संत के शब्द – एक आमन्त्रण

पूर्ण के किसी हिस्से में कोई अतिरिक्त पूर्णता तो नहीं होती। पूर्ण से पूर्ण निकलता है, तो भी पूर्ण ही शेष रहता है। क्या प्रतीक्षा करनी किसी नयी पत्ती की? क्या प्रतीक्षा करनी किसी भी फल की? असंख्य बार अनगिनत वृक्ष लगे हैं, और अनंत संख्या है पत्तों की, और फलों की जो लगे हैं, और गिरे हैं और ये चलता रहेगा। ये सब तो प्रकृति का बहाव है और प्रकृति मात्र देह है, ये सब तो देह का बहाव है आना-जाना, उठना-बैठना। मन ऐसा हो कि वो प्रतीक्षा में भी प्रतीक्षागत ना रहे, मन ऐसा हो कि जब वो पौधे को सींचे और कली की, फूल की, पत्ती की कामना भी करे, तब भी निष्काम रहे। मन ऐसा हो, जिसे साफ़-साफ़ पता हो कि आधीर होने से कुछ नहीं होगा, ऋतु आये ही फल होए। लेकिन साथ ही साथ, वो इस बोध में भी स्थित हो कि फल आएगा नहीं, फल है। कुछ भी नया जुड़ेगा नहीं क्यूंकि पूर्ण में कुछ नया जुड़ने का प्रश्न पैदा नहीं होता है। ना कुछ नया जुड़ेगा, ना कुछ पुराना कभी कहीं गया है। कभी कोई नया फल आने नहीं वाला, और पुराने जितने भी असंख्य फल आज तक लगे हैं, वो कहीं गए नहीं है।
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मन की दौड़ ही मन का बंधन है

‘मन का होना ही एक दौड़ है’ और व्यर्थ ही नहीं दौड़ रहा, उसे वास्तव में पहुंचना है; वो बेचैन है, उसकी बेचैनी झूठी नहीं है लेकिन मन का दौड़ना वैसा ही है, जैसे कोई इस कमरे के भीतर-भीतर दौड़ता रहे और उम्मीद उसने ये बाँध रखी हो कि वो कहीं पहुँच जाएगा। उसकी कोशिशों में कमी नहीं है, बस उसके पास डर है, दीवारें हैं और श्रद्धाहीनता है। खूब दौड़ता है, खूब मेहनत करता है; श्रमिक है मन लेकिन ये हिम्मत नहीं कर पाता है कि तोड़ ही दे दीवारें।
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हिमालय की गोद में 30वें अद्वैत बोध शिविर का आयोजन किया जाने वाला है।
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में रहने का और दुनिया भर के दुर्लभ ग्रंथों के अध्ययन के इस सुनहरे अवसर को न गवाएं।

तिथि: 24-27 मार्च
स्थान: टाइगर ग्रूव रिसोर्ट, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क रामनगर(उत्तराखंड)

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वह निःसंग है; मात्र वह ही है

कैवल्य का यही अर्थ होता है कि मात्र वो है, केवल वो है, उसके अलावा और कोई है ही नहीं। तो उसका कोई संगी है, ये प्रश्न ही नहीं पैदा होता। संगी का अर्थ ही हुआ कि दो है, कि परम सत्ता दो हैं। ना, वो असंग है। इसी को एकांकीपन कहते हैं। “नो पार्टनर हैज़ गॉड”, इसी बात को कहा जाता है ‘एकांकीपन’।
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