कामनाग्रस्त मन जगत में कामुकता ही देखेगा

काम, जीवन का ही हिस्सा है, जीवन को नहीं समझा है, काम को भी नहीं समझा है, जब काम को समझा नहीं जाता तो सर चढ़ के बोलता है| जब काम को समझा नहीं जाता, तो वो बिलकुल हावी हो जाता है मन पर| वो फिर एक रोज़मर्रा की, आमतौर की, छोटी घटना बन कर नहीं रह जाता, फिर वो जीवन का एक हिस्सा नहीं, वो जीवन पर छाया हुआ बादल बन जाता है| जिसने सब कुछ ढक रखा है, मेरा उठना, बैठना, हंसना, छूना, सोचना, सब काम से भरा हुआ है|
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वक्ता द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

https://prashantadvait.com/books-in-hindi/

कुर्बानी माने क्या?

क़ुर्बानी, आहुति या त्याग, यह स्वतः स्फूर्त बोध और और प्रेम की बातें होती हैं, ये सामाजिक नहीं होती हैं। जब प्यार होता है, तब एक रोटी में आधी-आधी रोटी, बाँट ली जाती है, उसको त्याग नहीं बोला जाता। वो प्रेम है और उसी प्रेम का सहज फल है- ‘त्याग।’ उसको त्याग कहना ही नहीं चाहिए, त्याग कहना, ज़रा अपमान सा होगा, वो तो प्रेम है।
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आप सभी आमंत्रित हैं:
‘स्पिरिचुअल हीलिंग’ पर आचार्य प्रशांत द्वारा शब्द योग सत्र में।
दिनांक:26.10.2016
स्थान: तीसरी मंजिल, G-39,सेक्टर-63, नॉएडा
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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जो भयानक है वो कुछ छीन नहीं सकता,जो आकर्षक है वो कुछ दे नहीं सकता

जाँच करें, थोड़ा प्रयोग करें। जो कुछ बहुत कीमती लगता है, उससे अपने आप को ज़रा सा दूर करें। जो कुछ बहुत डरावना लगता है उसके ज़रा नज़दीक आएँ और देखें कि क्या हो जाता है। क्या वास्तव में उतना फायदा या उतना नुकसान है, जितने की कल्पना कर रखी है? क्या मिल जाता है? क्या खो जाता है? आप जब किसी चीज़ को महत्वपूर्ण बना लेते हैं तो, आप उस पर किसी भी तरह का प्रश्न उठाना छोड़ ही देते हो। आप कहते हो “ऐसा तो है ही।’’ आप ये जाँचना ही छोड़ देते हो कि क्या वास्तव में ऐसा है?
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25वां अद्वैत बोध शिविर आचार्य प्रशांत के साथ आयोजित किया जाने वाला है।

दिनांक: 16 से 19 अक्टूबर

स्थान: मुक्तेश्वर, उत्तराखंड

आवेदन हेतु requests@prashantadvait.com पर ई-मेल भेजें।
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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सवाल अच्छे हैं पर सवालों से मुक्ति और भी अच्छी

जैसे डरने की लत लगती है , निर्भयता की भी समझ लो कुछ-कुछ वैसी ही लत लगती है;

उसका भी चस्का होता है। दोनों तरफ कुछ-कुछ आदत जैसी ही बात होती है, किसी को डरने की आदत लग जाती है किसी को न डरने की। हालांकि दोनों में बड़ा अंतर है; बड़ी दूर की बातें हैं, अलग-अलग आयाम हैं लेकिन फिर भी समझाने के लिए कह रहा हूँ कि दोनों समझ लो आदतें जैसी ही हैं।

एक बार न डरने का चस्का लग गया फिर उसमें ऐसा रस है, कि फिर डर लाख बुलाएगा और तुम हाँ नहीं बोलोगे, तुम कहोगे, “यही ठीक है”। पर शुरुआत करनी पड़ती है, शुरुआत हमेशा सबसे ज़्यादा मुश्किल होती है।

न बंधन है,न मुक्ति चाहिए

“न मैं बद्ध हूँ, और न साधक”

“मैं बंधा हुआ नहीं हूँ।” और जो बंधा हुआ नहीं है, उसको बंधन से छूटने की कामना भी क्यों? “मैं नहीं हूँ बंधा हुआ। मुझे बंधे रहने में कोई सुख नहीं है। मैंने बंधे रहने का व्रत नहीं ले रखा है। और मैंने बंधन से छूटने का भी कोई व्रत नहीं ले रखा है।” दोनों ही तरफ़ अहंकार को बचने के लिए एक छोटी से जगह मिल जाती है। कोहम को उत्तर मिल जाता है।

“कौन हूँ मैं? – बंधा हुआ।”

अच्छा!

“और कौन हूँ मैं? – मुक्त।”

इन दोनों ही उत्तरों में कोई विशेष अंतर नहीं है क्योंकि अभी मौन तो आया नहीं। उत्तर मौजूद है। अहंकार हंस रहा है; ठिकाना मिल गया है उसको।

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