असली आज़ादी है आत्मा

शरीर भर है जिसे पूरी तरह बाँधा जा सकता है। मन पर सीमा लगाने की कोशिश की जा सकती है पर वह बहुत सफल होगी नहीं और आत्मा पर तो वह कोशिश भी नहीं की जा सकती।

तो इंसान है जो बाँधने की कोशिश करता है और वह भी उसी हद तक जिस हद तक तुम्हारा आचरण है।

अब एक इंसान दूसरे इंसान के आचरण को बाँधने की कोशिश कर रहा है।

सोच- सोच कर देखा तो क्या देखा

जहाँ भी ऑब्जेक्ट होगा, जहाँ भी विषय होगा, वहाँ पर उसे देखने वाला होगा।
एक केंद्र होगा, जहाँ से देख रहे हो।
ऑब्जेक्ट (विषय) है, तो सब्जेक्ट (व्यक्ति) तो होगा।

और वो सब्जेक्ट हमेशा कौन होता है? अहंकार।
अपने ही सन्दर्भ में हम दुनिया को देखते हैं।

तो वास्तव में तभी देखा, जब न रूप दिखा, न नाम दिखा, न आकार दिखा।

धर्म परम नास्तिकता की कला है

दुनिया इसलिए कभी धार्मिक हो नहीं पायी। क्योंकि हमने ये नहीं पूछा कि ‘दुनिया क्या है?’ हम यह पूछते हैं कि ‘दुनिया चल कैसे रही है?’ और अगर पूछेंगे कि ‘दुनिया क्या है’ तो पूछना पड़ेगा कि ‘मैं कौन हूँ?’ और ‘मैं कौन हूँ?’

यह पूछना बड़े घाटे का सौदा है, अहँकार को बड़ी चोट लगती है।

तो यह जो सारा खेल चल रहा है, यह ईगो का खेल है, उसपर बड़े-बड़े महल खड़े कर दिये गये हैं। लेकिन उसके नीचे वो छोटी-सी ईगो बैठी हुई है और कुछ भी नहीं।

बुनियाद उसकी वैसी ही है, जैसे कि कोई बादशाह अपनी हवस को समर्पित करके कोई बहुत बड़ा प्रेम महल खड़ा कर दे और वो प्रेम-महल दिखने में बहुत बड़ा है पर उसकी बुनियाद में क्या है- ऊँची-सी हवस। जैसे कि कोई बादशाह बहुत बड़ा मक़बरा अपने आपको समर्पित कर दे और वो दिखने में तो बहुत बड़ा है पर उसकी बुनियाद में क्या है- एक ऊँची इन्सिक्यूरिटी कि मेरे बाद भी मेरा नाम रहे।

ठीक उसी तरीके से हमने बातें बहुत बड़ी-बड़ी कर दी हैं। 50 ग्रंथ आ गये हैं, परमात्मा, गॉड, अल्लाह, पर उन सबके नीचे हमारी गन्धाती हुई ईगो बैठी है। उसको अगर आप हटा दें तो ये जो धर्मों का पूरा सिस्टम है, ये बिल्कुल ढ़ह जायेगा, चरमरा के गिरेगा। ताश का महल है ये, कुछ नहीं रखा है इसमें।

मैं लड़कियों से बात क्यों नहीं कर पाता?

ऐसे लोगों से बचना जिन्हें आँख बचा कर बात करने की आदत हो। और बहुत हैं ऐसे। ऐसे क्षणों से भी बचना जिसमें सहज भाव से, निर्मल भाव से, सरल होकर, निर्दोष होकर किसी को देख ना पाओ। ऐसे क्षणों से भी बचना।

एक नज़र होती है जो समर्पण में झुकती है, प्यारी है वो नज़र। और एक नज़र होती है जो ग्लानि में और अपराध की तैयारी में झुकती है, उस नज़र से बचना।

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