तुम्हारी ज़िन्दगी में ऐसा है क्या जो दुनिया से निराला हो?

शर्त बस उसी ईमानदारी की है, चाहे भीतर देखो, चाहे बाहर| भीतर देखने के लिए जितनी ईमानदारी चाहिए, उतनी ही ईमानदारी बाहर देखने के लिए

जन्म देखो तो अपना देखो, मृत्यु देखो तो अपनी देखो

किसी को जन्मते देखो तो अपना जन्म याद कर लो, तुम भी ऐसे ही जन्मे थे| आज तुम किसी का जन्मोत्सव देखते हो तुम्हे देर नहीं

तुम दुनिया से भिन्न नहीं हो

दो देश नहीं लड़ते, हिंसा सर्वप्रथम मनुष्य के मन में जन्म लेती है| बड़े से बड़े बम की जो उर्जा है वो भौतिक उर्जा नहीं है वो मानसिक उर्जा है| तुम ये मत समझ लेना कि परमाणु हथियार  भौतिक उर्जा  से चलता है, वो मानसिक उर्जा से चलता है| दिखती भौतिक है, तुम उसे नाप सकते हो तुम कह सकते हो कि इतने मेगा टन का विस्फोट था इतनी जूल ऊर्जा इसमें से निकली, किसी भी तरीके से नाप सकते हो पर ध्यान से देखोगे तो समझ आएगा कि वो उर्जा तुम्हारी घृणा की है| वो उर्जा यूरेनियम की या प्लूटोनियम की बाद में है सर्वप्रथम वो उर्जा तुम्हारी घृणा की उर्जा है|

आचार्य प्रशांत
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सत्र देखें: आचार्य प्रशांत: तुम दुनिया से भिन्न नहीं हो (You are not separate from the world)

 
 

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सम्पादकीय टिप्पणी :

आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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कोहम् का वास्तविक अर्थ है ‘तुम कौन?’

यह जो प्रश्न है: ‘मैं कौन हूँ’, यह वास्तव में यह प्रश्न है: ‘तुम कौन हो’।

“मैं कौन हूँ?” नहीं। क्योंकि यह जानने के लिए कि यह ‘कर्ता’ कौन है, आपको उस ‘कर्ता’ से हमेशा ज़रा दूरी बनानी होती है। जब तक आप उस कर्ता के साथ पूरे सम्बद्ध हैं, तब तक आप कभी यह पूछेंगे ही नहीं कि यह ‘कर्ता’ कौन है। आप तुरंत कह देंगे: “यह ‘कर्ता’, ‘मैं’ हूँ।
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29वां अद्वैत बोध शिविर
24 से 27 फरवरी, शिवपुरी, ऋषिकेश
आवेदन भेजने हेतु ई-मेल भेजें: requests@prashantadvait.com पर

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श्री अंशु शर्मा: +91 8376055661
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सही कर्म कौन सा?

ये मत पूछो कि, ‘ मुझे कैसे पता कि मेरा एक्शन पूर्णतया सही है या नहीं?’ ज़्यादा ईमानदारी की बात यह है कि, ‘मुझे जो चीज़ पता है कि सही है, मैं वो भी कर पा रहा हूँ या नहीं?’ ग़लती यह नहीं है कि कोई पूर्णतया सही कर्म था और वो तुम नहीं कर पाए; ग़लती यह थी कि जो तुम को पता था कि सही है, तुममें वो करने की भी हिम्मत नहीं थी| लोग आमतौर पर यह पूछते हैं कि, ‘हम कैसे पता करें कि ‘‘सही कर्म’ क्या है?’’’ मैं कहता हूँ कि सवाल हटाओ!
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25वां अद्वैत बोध शिविर आचार्य प्रशांत के साथ आयोजित किया जाने वाला है।

दिनांक: 16 से 19 अक्टूबर

स्थान: मुक्तेश्वर, उत्तराखंड

आवेदन हेतु requests@prashantadvait.com पर ई-मेल भेजें।
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आगे और करने का विचार उन्हीं को आता है जो अभी के काम में पूरे नहीं होते

आपका काम है ये जान लेना कि मैं नकली में फँसा हुआ हूँ और उसके आगे पूर्णविराम।

अब इसके आगे का हम नहीं जान सकते। इसके आगे का, जानने के क्षेत्र में आता ही नहीं तो हम जान कहाँ से लेंगे। हमने जान लिया कि ‘गड़बड़ है!’ और इस जानने के फलस्वरूप जो भी ईमानदारी से कर्म उपजा, वो हमने होने दिया।

ध्यान रखियेगा, इतना ही जाना है आपने कि बीमारी है; ‘स्वास्थ्य क्या है?’ ये नहीं जान लिया। कुछ होता होगा पर ये पक्का है कि वो नहीं है तो हम मज़े में नहीं हैं; वो नहीं है तो हमें अटपटा सा लगता है; वो नहीं है तो हमें घोर कष्ट होता है।

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