जीवन गँवाने के डर से अक्सर हम जीते ही नहीं

जब आदेश का पालन करते हो, तो फिर जहाँ से आदेश आता है, वहीँ से उस आदेश के पालन की ऊर्जा भी आ जाती है। वही दे देता है उर्जा, और वही एक मात्र उम्मीद है तुम्हारी, वहीं से जीत है तुम्हें, और कहीं से नहीं मिलेगी। भूलना नहीं कि तुम्हारी अपनी ऊर्जा तो तुम दूसरों को दे आए हो, तुमने अपनेआप को तो बेच ही दिया है। तुम्हारी अपनी बंदूक तो अब तुम्हारे ऊपर ही चलेगी। ये संसार तुम्हारे ऊपर जो बंदूके ताने बैठा है ये संसार ये नहीं है, ये तुम्हारी बंदूके हैं। ये दुनिया जो तुम्हें बन्धनों में कसे बैठी है, ये हक़ दुनिया को किसने दिया? तुमने दिया।
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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सुनने का वास्तविक अर्थ

विचार, विचार को पकड़ता है और मौन, मौन से जुड़ता है। मन शब्दों के अलावा कुछ सुन नहीं सकता, मौन को मौन ही सुनेगा। कीमत सिर्फ़ मौन की है। सुनने का अर्थ है इधर के मौन ने, उधर के मौन से एका कर लिया। मौन, मौन से जुड़ गया; अनंतता, अनंतता से मिल गई। सुनने का अर्थ है: ‘’मैं, मैं न रहा, तू तू न रहा; मैं भी खाली, तू भी खाली।’’ खाली, खाली से मिल गया; पूर्ण पूर्ण से मिल गया। अपूर्ण कभी पूर्ण से नहीं मिल पाएगा। अपूर्ण और पूर्ण तो आयाम ही अलग-अलग हैं, उनका कोई मिलन नहीं होता। पूर्ण से मिलने के लिए, पूर्ण ही होना पड़ता है। मौन को सुनने के लिए, मौन ही होना पड़ता है।
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शराबखाने में और वक़्त बिताने से होश में नहीं आ जाओगे

जितना तुम्हारा देह भाव गहरा रहेगा, उतना ज़्यादा तुम उम्र को इज्ज़त दोगे| सवाल ये नहीं है कि तुम्हारे भीतर ये संस्कार कहाँ से आ गया कि कोई बूढ़ा होते ही इज्ज़त का पात्र हो जाता है; सवाल ये है कि तुम अपनी देह को किस रूप में देखते हो? क्योंकि जो किसी दूसरे को इस कारण इज्ज़त देगा कि उसके बाल पक गए हैं, वो स्वयं भी यही अपेक्षा रखेगा कि, ‘’मुझे भी मेरी उम्र के अनुसार अब आदर मिले|’’

तुम्हारे मन से ये भावना हट जाए — दूसरे को छोड़ो — तुम्हारे मन से अपने लिए ये भावना हट जाए कि, “मैं शरीर हूँ, और मुझे मेरी उम्र के अनुसार व्यवहार मिलना चाहिए,” तो फिर तुम पूरे संसार को उसकी उम्र की मुताबिक नहीं देखोगे| तुम अपने आप को उम्र के मुताबिक़ देखते हो ना, इसीलिए पूरी दुनिया को उम्र के मुताबिक देखते हो| तुम कहते हो, “अभी तो मैं जवान हूँ, अभी तो मेरी ये उम्र है, वो उम्र है|” जब तुम अपने आप को कहते हो कि, ‘’मैं जवान हूँ. और जवान होने से ये निर्णय होता है कि मुझे क्या करना चाहिए,’’ तो तुम दूसरे को भी कहते हो कि, “अब ये जवान नहीं है और इसकी प्रौढ़ता से निर्णय होगा कि ये क्या करे?”
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29वां अद्वैत बोध शिविर
24 से 27 फरवरी, शिवपुरी, ऋषिकेश
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अर्थ द्वारा समझे तो अच्छा, बिना अर्थ समझे तो और अच्छा

सुना मात्र तब जाता है, जब शब्द अर्थहीन हो जाते हैं।

वास्तव में सुना तभी गया, जब भूल ही गए कि क्या कहा जा रहा है। हर कहने-सुनने का जो परम उद्देश्य है, वो ये भूल जाना ही है।
समझिएगा बात को। सुनने की निम्नतम अवस्था तो वही है कि शब्दों पर भी ध्यान नहीं गया और फिर आगे बढ़ते हो तो चलो, कम से कम शब्द कान में पड़ने लग गए। स्मृति ने काम करना शुरू किया। उनमें अर्थ भरने शुरू कर दिए, पर वास्तविक सुनना अभी भी नहीं हो पाया।
असली सुनना तब हुआ, जब भूल ही गए कि किसी ने कहा क्या था?
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आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में 29 वां अद्वैत बोध शिविर िआयोजित किया जाने वाला है।
आचार्य जी के सानिध्य में रहने का और दुनिया भर के दुर्लभ ग्रंथों के अध्ययन के इस सुनहरे अवसर को न गवाएँ।

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श्री कुंदन सिंह: +91 – 9999102998
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सरलतम में सरलता से प्रवेश

कहते हैं कि अगर उसके कोई करीब होता है तो या तो संत, या बच्चा क्योंकि दोनों में क्या होती है? सरलता। वो परम सरल है। तो उसको पाना है तो, तुम भी सरल हो जाओ। जितने सरल होते जाओगे, उसको उतना पाते जाओगे; और गाठों से, कलह से, द्वेष से, और चालाकी से जितने भरते जाओगे, उससे उतने दूर होते जाओगे। हल्के हो जाओ, सरल हो जाओ। सीधे-साधे बिलकुल, कोई चतुराई नहीं, कोई होशियारी नहीं। वो है न, ‘मेरी सब होशियारियां ले लो, मुझको एक जाम दे दो।’
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करीब आने का क्या अर्थ है?

तुम अपने सीने में सिर्फ़ डर ही लेकर नहीं घूम रहे। तुम अपने सीने में बोध का बीज भी लेकर के घूम रहे हो। उस बोध के बीज के बिना तो, वह भय भी नहीं आ सकता था! कोई आदमी अगर सूरज को देखना नहीं चाहता और अँधेरे में पनाह मांगता है तो एक बात तो पक्की है, अँधा नहीं है वो। अँधे नहीं हो। बस आदत पाल ली है अँधेरों की, बिलों में छुपने की। और सूरज से भागोगे कैसे? सूरज तुम्हारे ह्रदय में बैठता है। वहाँ कोई अन्धकार नहीं होता। मन को तुम चाहे जितना भर लो अँधेरे से, ह्रदय में तो प्रकाश ही रहता है। तो प्रकाश से भागोगे कैसे? मन कहीं भी जाएगा, कितने भी अँधेरे में छुपेगा, अपने ही स्रोत से, अपने ही केंद्र से कहाँ भागेगा? वहाँ प्रकाश है।
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प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन पच्चीस से ज्यादा अद्वैत बोध शिविरों का आयोजन करने के बाद, इस महीने की 26 तारीख को अपना 28वां बोध शिविर आयोजित करने जा रही है।

28वां अद्वैत बोध शिविर: एक पुकार परम की 💐
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में समय बिताने और विभिन्न स्रोतों से लिए गए श्रेष्ठतम कोटि के ग्रंथों को पढ़ने का एक अनूठा अवसर है २८वां अद्वैत बोध शिविर।

शिविर का हिस्सा बनने हेतु, requests@prashantadvait.com पर एक ईमेल करें ।
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