स्वयं का बचाव जीवन से पलायन

पलायन क्या है समझ रहे हो? मैं कुछ हूँ, एक ठोस जमी हुई संरचना। और वो ठोस संरचना, अपने विगलन को एस्केप करना चाहता है। इसलिए एस्केप शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। उसे बदलाव, परिवर्तन, संशोधन, विगलन इन सबसे बचना है।

अब सवाल ये उठता है कि फ़िर एस्केप क्या नहीं है ? फिर क्या है जो एस्केप नहीं है?

ऐसी एक्टिविटी जो तुम्हारे होने से नहीं निकल रही है, बल्कि तुम्हारे होने को ही परिवर्तित कर देगी। जो तुम्हारे होने को ही बदल देगी। तुम जो साधारण खाना खाते हो, वो कैसा होता है? वो, वही होता है जो तुम खाना चाहते हो। तो वो तुम्हारे मानसिक संरचना को बदल नहीं सकता।

यथार्थ है सहज जानना

हमारा जीवन ऐसा ही है- ‘मेरे सपने क्यों टूट गए?’ अरे सपने थे, टूटेंगे ही, यथार्थ में आओ| क्योंकि तुम्हें सिखाया गया है, ‘ऊँचा सोचो, बड़ा सोचो’, तो तुम्हारा जीवन ही सपनों से भर गया है|

मनुष्य मशीन भर नहीं

वक्ता: यह जो हमारा मस्तिष्क है, यह करीब-करीब एक यंत्र है। सच तो यह है कि हम निन्यानवे प्रतिशत यंत्र ही हैं और जैसे एक यंत्र की

अपनी कमज़ोरियों को कैसे जानूँ?

वक्ता: विवेक का सवाल है कि हम अपनी कमजोरियों को कैसे जान सकते हैं| कैसे पता कि कुछ कमज़ोरी है? कैसे पता कि कुछ कमी है ही

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