आत्मा माने क्या?

“स्वात्मा हि प्रतिपादितः” का अर्थ है कि –
‘आत्मा’ वो तत्व है, जिसका विस्तार ‘अहंकार’ और ‘संसार’ हैं।

जब विस्तार सिमट जाता है, तो सिर्फ़ ये तत्व जलता रहता है,
प्रकाशित होता रहता है।
जब ये विस्तार फैल जाता है, तो विस्तार ही विस्तार दिखाई देता है,
तब यह तत्व आसानी से प्रतीत नहीं होता।
 
समेट लो तो ‘आत्मा’, फैला दो तो ‘संसार’।

आनंद क्या है?

आनंद मन की वो स्थिति है, जिसमें वो अपनी ही मौज में है। ऐसा नहीं है कि उसे दुनिया से कुछ लेना-देना नहीं है। वो दुनिया में काम कर रहा है, दुनिया में रह रहा है, दुनिया में परिणाम भी आ रहे हैं, पर वो उन परिणामों को बहुत गंभीरता से नहीं ले रहा है। वो उन परिणामों को मन में गहरे नहीं उतर जाने दे रहा। वो कह रहा है, “परिणाम हैं, ठीक है। जीते, बहुत बढ़िया बात। हारे, तो भी ठीक”।

मेरा असली स्वभाव क्या है?

कुत्रापि खेद: कायस्य जिह्वा कुत्रापि खेद्यते।  मन: कुत्रापि तत्त्यक्त्वा पुरुषार्थे स्थित: सुखम्।।  ~ अष्टावक्र गीता(१३.२)  अनुवाद: शारीरिक दुःख भी कहाँ है, वाणी के दुःख भी

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