अर्थ द्वारा समझे तो अच्छा, बिना अर्थ समझे तो और अच्छा

सुना मात्र तब जाता है, जब शब्द अर्थहीन हो जाते हैं।

वास्तव में सुना तभी गया, जब भूल ही गए कि क्या कहा जा रहा है। हर कहने-सुनने का जो परम उद्देश्य है, वो ये भूल जाना ही है।
समझिएगा बात को। सुनने की निम्नतम अवस्था तो वही है कि शब्दों पर भी ध्यान नहीं गया और फिर आगे बढ़ते हो तो चलो, कम से कम शब्द कान में पड़ने लग गए। स्मृति ने काम करना शुरू किया। उनमें अर्थ भरने शुरू कर दिए, पर वास्तविक सुनना अभी भी नहीं हो पाया।
असली सुनना तब हुआ, जब भूल ही गए कि किसी ने कहा क्या था?
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आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में 29 वां अद्वैत बोध शिविर िआयोजित किया जाने वाला है।
आचार्य जी के सानिध्य में रहने का और दुनिया भर के दुर्लभ ग्रंथों के अध्ययन के इस सुनहरे अवसर को न गवाएँ।

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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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मैं संतुष्ट क्यूँ नहीं रह पाता?

आनंद तुम्हारा स्वभाव न होता तो तुम्हें अफ़सोस किस बात का होता? तुम दुखी हो और दुःख के अतिरिक्त कोई संभावना ही न रहती, तुम कहते, ‘’ठीक! मैं वैसा ही हूँ, जैसा मैं हो सकता हूँ, और विकल्प क्या है? यही तो मेरी नैसर्गिक अवस्था है और कभी दुःख से कभी ऊबे तो सुख। ठीक है! यही तो खेल है, चल रहा है।’’पर दुःख में तुम टिक पाते नहीं, सुख की आशा रहती हैं; और सुख में तुम टिक पाते नहीं, दुःख की आशंका रहती है। टिक इसलिए नहीं पाते क्यूँकी आसमान है, आनन्द है, वो अपना अहसास कराता रहता है पिंजरे के पक्षी को।
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26वां अद्वैत बोध शिविर आयोजित किया जा रहा है आचार्य प्रशांत के साथ।
दिनांक: 26 से 29 नवम्बर
स्थान: शिवपुरी, ऋषिकेश

आवेदन हेतु ई-मेल भेजें requests@prasantadvait.com भेजें।
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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उचित विचार कौन सा?

हार्दिक आमंत्रण आपको श्री प्रशांत के साथ २२वें अद्वैत बोध शिविर का|

मुक्तेश्वर के पर्वतों में गहन आध्यात्मिक आनंद का अनुभव करें|
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आवेदन आमंत्रित हैं:

अद्वैत बोध शिविर
श्री प्रशांत के साथ

(9 से 13 नवंबर, ’15)
मुक्तेश्वर, उत्तराँचल

मेल लिखें: bodh.camp@advait.org.in
जानकारी हेतु: रोहित राज़दान @ 9910685048
http://www.advait.org.in/learning-camps.html

धर्म परम नास्तिकता की कला है

दुनिया इसलिए कभी धार्मिक हो नहीं पायी। क्योंकि हमने ये नहीं पूछा कि ‘दुनिया क्या है?’ हम यह पूछते हैं कि ‘दुनिया चल कैसे रही है?’ और अगर पूछेंगे कि ‘दुनिया क्या है’ तो पूछना पड़ेगा कि ‘मैं कौन हूँ?’ और ‘मैं कौन हूँ?’

यह पूछना बड़े घाटे का सौदा है, अहँकार को बड़ी चोट लगती है।

तो यह जो सारा खेल चल रहा है, यह ईगो का खेल है, उसपर बड़े-बड़े महल खड़े कर दिये गये हैं। लेकिन उसके नीचे वो छोटी-सी ईगो बैठी हुई है और कुछ भी नहीं।

बुनियाद उसकी वैसी ही है, जैसे कि कोई बादशाह अपनी हवस को समर्पित करके कोई बहुत बड़ा प्रेम महल खड़ा कर दे और वो प्रेम-महल दिखने में बहुत बड़ा है पर उसकी बुनियाद में क्या है- ऊँची-सी हवस। जैसे कि कोई बादशाह बहुत बड़ा मक़बरा अपने आपको समर्पित कर दे और वो दिखने में तो बहुत बड़ा है पर उसकी बुनियाद में क्या है- एक ऊँची इन्सिक्यूरिटी कि मेरे बाद भी मेरा नाम रहे।

ठीक उसी तरीके से हमने बातें बहुत बड़ी-बड़ी कर दी हैं। 50 ग्रंथ आ गये हैं, परमात्मा, गॉड, अल्लाह, पर उन सबके नीचे हमारी गन्धाती हुई ईगो बैठी है। उसको अगर आप हटा दें तो ये जो धर्मों का पूरा सिस्टम है, ये बिल्कुल ढ़ह जायेगा, चरमरा के गिरेगा। ताश का महल है ये, कुछ नहीं रखा है इसमें।

सेवा से पहले स्वयं

स्व ही सब कुछ है | स्व जड़ है और सेवा फूल है | अब समझ में आ रही है बात ? स्व जड़ है और सेवा उस पेड़ का फूल है | सेवा वहीं होगी जिस पेड़ की जड़ें मज़बूत हैं | जो पेड़ स्वस्थ है उसी पर बड़े प्यारे फूल खिलते हैं | बहुत अच्छे फूल आते हैं | पर अगर तुम ये चाहो कि जड़ें तो सड़ी रहें पर फूल तब भी आ जायें, ऐसा हो सकता है क्या ?

स्व मूल है, सेवा फूल है | मूल मतलब जड़; स्व पर ध्यान दो, सेवा अपनेआप हो जायेगी | जो भी कोई तुम्हें बताये सेवा जरुरी है, मदद ज़रुरी है, सहायता, सेवा ज़रुरी है | उनसे कहना ऐसे सेवा नहीं हो सकती | बीमार आदमी सेवा नहीं कर सकता |

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