मन के मूड़े देखि करि, ता संग लीजै औट

मन ऐसा न रखो कि वह लगातार कहीं पहुँचने की इच्छा रखता हो,
जिसके भीतर महत्वकांक्षाएँ भरी हुई हों।

जिस पर जब इधर-उधर से आक्रमण होते हों,
विषयों के, वासनाओं के, इच्छाओं, कामनाओं के, दृश्यों के, ध्वनियों के,
तो वो जो जल्दी से बहक जाता हो।

बाहरी बदलाव क्यों ज़रूरी हैं?

हम जैसा जीवन जी रहे हैं, वैसा ही जीते रहें, और साथ ही साथ, उलझनों से मुक्त हो जाएँ, सत्य के समीप भी आ जाएँ, जीवन को समझ जाएँ, मूर्ख जैसे न रह जाएँ, बोध हममें जगे – ये असंभव है ।

जो अपने जीवन को बाहर से बदलने से रोकेगा, उसका आतंरिक विकास भी बाधित हो जाएगा ।

~श्री प्रशांत

सकारात्मक सोच- मात्र भ्रम

हम मन के मूलभूत द्वैत को नहीं समझते । मन में जो कुछ होता है वो अपने जोड़े के साथ होता है पर चूँकि हमारी नज़रें पूरे को नहीं देख पातीं तो इसलिए हम सिर्फ सुख को देख पाते हैं और ये नहीं समझ पाते कि ये सुख मिल ही इसीलिए रहा है क्योंकि हम बहुत दुःखी हैं । जो दुःखी नहीं हो, उसे सुख मिल ही नहीं सकता और चूँकि हमें सुख चाहिए, इसलिए हम ख़ूब-ख़ूब दुःखी होते हैं । ख़ूब दुःखी हो जाओ, फ़िर सुख मिले जायेगा । और होता भी यही है, जितना दुःखी होगे, उतना सुख मिलेगा ।

स्वयं का बचाव जीवन से पलायन

पलायन क्या है समझ रहे हो? मैं कुछ हूँ, एक ठोस जमी हुई संरचना। और वो ठोस संरचना, अपने विगलन को एस्केप करना चाहता है। इसलिए एस्केप शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। उसे बदलाव, परिवर्तन, संशोधन, विगलन इन सबसे बचना है।

अब सवाल ये उठता है कि फ़िर एस्केप क्या नहीं है ? फिर क्या है जो एस्केप नहीं है?

ऐसी एक्टिविटी जो तुम्हारे होने से नहीं निकल रही है, बल्कि तुम्हारे होने को ही परिवर्तित कर देगी। जो तुम्हारे होने को ही बदल देगी। तुम जो साधारण खाना खाते हो, वो कैसा होता है? वो, वही होता है जो तुम खाना चाहते हो। तो वो तुम्हारे मानसिक संरचना को बदल नहीं सकता।

नाम-पहचान संयोग मात्र

ये सब एक जोक है, इसको जोक ही मानना| वो एक्टिविटी बस यही बता रही है कि इस चीज़ों के लिए सीरियस हो जाने की कोई आवश्यकता नहीं है| ये बस ऐसे ही हैं, एक्सीडेंटल; बाहर से आईं हैं और बाहर को ही चली जायेंगी| और लड़कियों को तो अच्छे से पता है, बेचारी आज गुप्ता होती हैं, कल अग्रवाल बन जाती हैं| थोड़ी मॉडर्न हो गयी है तो ‘गुप्ता अग्रवाल’ बन जाती हैं|

इशारा किधर को कर रहा हूँ, समझो| ये दी जाने वाली चीज़ें हैं, ये बदल जानी हैं|

अलग-अलग धर्म क्यों हैं?

किसी ने उगता हुआ सूरज देखा । किसी ने बरसात का सूरज देखा । किसी ने अमेरिका में बैठकर देखा । किसी ने अफ्रीका में बैठकर देखा । और सबने देखा सूरज लेकिन आधा-तिरछा देखा या किसी माध्यम से देखा ।

अब जो देखने वाले थे, वो चले गए । जिन्होंने देखा था, वो चले गये । उनकी लिखी किताबें बची हैं । किताबों में ज़िक्र किसका है- ‘सूरज का और चश्मे का’ । सूरज तो पढ़ने वाले जान नहीं पाते क्योंकि सूरज तो बताने की चीज़ नहीं है । सूरज तो अनुभव करने की चीज है । सूरज तो जान नहीं पाते । हाँ, चश्मे को जान जाते हैं ।

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