गुरु वचन – अहंकार नाशी

बहुत तरह के संबंध होते हैं हमारे।

सबसे निचले तल पर शरीर से शरीर का संबंध होता ही है, और ध्यान से आप देखेंगे तो अधिकांशतः जो हमारे संबंध होते हैं वह इसी श्रेणी में आते हैं, शरीर से शरीर। शरीर का अर्थ है पदार्थ, जहाँ कहीं भी व्यक्ति पदार्थ भर है वहाँ संबंध शरीर से शरीर तक का है।

फ़िर आप उससे थोड़ा ऊपर उठते हैं, तो मन के संबंध बनने लग जाते है। यहाँ पर कम ध्यान दिया जाता है कि आप दिखते कैसे हो, यहाँ पर ध्यान इस पर चला जाता है कि आप सोचते कैसे हो। आपकी विचारणा कैसी है, आप किस विचारधारा से आ रहे हो, आपके मत कैसे हैं।

फ़िर एक संबंध होता है गुरु का और शिष्य का, प्रेम का संबंध, यह अपने आप में अकेला संबंध है जो न शरीर का है न मन का है, यह संबंध कहीं और का है। पर यह कहाँ का है यह आप कैसे जानोगे जबतक आपने अपने आप को शरीर और मन ही समझा है?

इसी कारण गुरु रहें आते हैं, पड़े रह जाते हैं, पूरा अस्तित्व ही गुरु है, गुरुओं की कोई कमी नहीं, लेकिन उनसे लाभ किसी को नहीं मिल पाता।

बोध और परितोष

सारा जो बोध-साहित्य है, बस वो यही है कि अंततः तुम चाहते ही यही हो कि थम जाऊँ, तो थम ही जाओ ना! दौड़ क्यों रहे हो?

जो जिस कारण भी दौड़ रहा है, क्यों दौड़ रहा है? कि कभी रुक सके|

इसीलिए दौड़ रहा है ना? जब रुकना ही ध्येय है, तो रुक ही क्यों नहीं जाते?

तुम रुक इसीलिए नहीं जाते क्योंकि तुमसे कहा गया है कि ‘रुकना आगे है’| पर जाननेवालों ने तुम्हें ये समझाया है कि आगा-पीछा कुछ होता नहीं| जो है, वो यही है| रुकना है तो तत्क्षण रुको! इसी पल रुको! आगे सिर्फ आशा है और पीछे सिर्फ़ यादें हैं| रुकना या होना बस इसी पल है|

धर्म परम नास्तिकता की कला है

दुनिया इसलिए कभी धार्मिक हो नहीं पायी। क्योंकि हमने ये नहीं पूछा कि ‘दुनिया क्या है?’ हम यह पूछते हैं कि ‘दुनिया चल कैसे रही है?’ और अगर पूछेंगे कि ‘दुनिया क्या है’ तो पूछना पड़ेगा कि ‘मैं कौन हूँ?’ और ‘मैं कौन हूँ?’

यह पूछना बड़े घाटे का सौदा है, अहँकार को बड़ी चोट लगती है।

तो यह जो सारा खेल चल रहा है, यह ईगो का खेल है, उसपर बड़े-बड़े महल खड़े कर दिये गये हैं। लेकिन उसके नीचे वो छोटी-सी ईगो बैठी हुई है और कुछ भी नहीं।

बुनियाद उसकी वैसी ही है, जैसे कि कोई बादशाह अपनी हवस को समर्पित करके कोई बहुत बड़ा प्रेम महल खड़ा कर दे और वो प्रेम-महल दिखने में बहुत बड़ा है पर उसकी बुनियाद में क्या है- ऊँची-सी हवस। जैसे कि कोई बादशाह बहुत बड़ा मक़बरा अपने आपको समर्पित कर दे और वो दिखने में तो बहुत बड़ा है पर उसकी बुनियाद में क्या है- एक ऊँची इन्सिक्यूरिटी कि मेरे बाद भी मेरा नाम रहे।

ठीक उसी तरीके से हमने बातें बहुत बड़ी-बड़ी कर दी हैं। 50 ग्रंथ आ गये हैं, परमात्मा, गॉड, अल्लाह, पर उन सबके नीचे हमारी गन्धाती हुई ईगो बैठी है। उसको अगर आप हटा दें तो ये जो धर्मों का पूरा सिस्टम है, ये बिल्कुल ढ़ह जायेगा, चरमरा के गिरेगा। ताश का महल है ये, कुछ नहीं रखा है इसमें।

सेवा से पहले स्वयं

स्व ही सब कुछ है | स्व जड़ है और सेवा फूल है | अब समझ में आ रही है बात ? स्व जड़ है और सेवा उस पेड़ का फूल है | सेवा वहीं होगी जिस पेड़ की जड़ें मज़बूत हैं | जो पेड़ स्वस्थ है उसी पर बड़े प्यारे फूल खिलते हैं | बहुत अच्छे फूल आते हैं | पर अगर तुम ये चाहो कि जड़ें तो सड़ी रहें पर फूल तब भी आ जायें, ऐसा हो सकता है क्या ?

स्व मूल है, सेवा फूल है | मूल मतलब जड़; स्व पर ध्यान दो, सेवा अपनेआप हो जायेगी | जो भी कोई तुम्हें बताये सेवा जरुरी है, मदद ज़रुरी है, सहायता, सेवा ज़रुरी है | उनसे कहना ऐसे सेवा नहीं हो सकती | बीमार आदमी सेवा नहीं कर सकता |

फ़ायदे का फ़ायदा क्या?

फ़ायदे का फ़ायदा क्या है?

तुम बचपन से ही तो फ़ायदे की तलाश में नहीं थे| तुम्हें ये किसने सिखाया कि फ़ायदा बड़ी बेहतरीन चीज़ है|

फँस गये?

जो ये फ़ायदा तुम खोज रहे हो, तुम्हें कैसे पता कि फ़ायदे का कुछ फ़ायदा होता है?

ये तुमने बस सुन लिया है| तुम्हारे चारों ओर एक समाज है जो फ़ायदे के पीछे भाग रहा है| घर में भी तुमने यही देखा है, तो तुम्हें लगता है कि फ़ायदा कोई बहुत अच्छी बात होगी|

तुम्हें कैसे पता कि फ़ायदा फ़ायदेमंद है?

अपने ऊपर भरोसा क्यों नहीं है?

बात सिर्फ़ आत्मविश्वास की नहीं है । ‘हमें विश्वास ही नहीं है । हमें किसी भी व्यक्ति पर, चीज़ पर, घटना पर, किसी भी बात के होने पर यकीन ही नहीं है । हमें यह भी ठीक-ठीक यकीन नहीं है कि हमारे पाँव-तले ज़मीन है कि नहीं है ।

यह सुनने में अतिश्योक्ति लगती है, पर बात ऐसी ही है । तुम जिन भी बातों पर बड़ा गहरा यकीन करते हो, कोई आकर, कुछ भारी और तीख़े तर्क देकर, उन सब यकीनों को हिला सकता है । तुम्हारे पास ऐसा कुछ भी नहीं है, जो जड़ से उखाड़ा न जा सकता हो ।

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