इन्तज़ार के मायने

जो भी कोई भविष्य के इंतज़ार में जी रहा है, वो अपने वर्त्तमान को कड़वा बना के रहेगा।

और जो कोई वर्त्तमान में ही जी रहा है, उसके लिए वर्त्तमान ही मीठा है।

उसे भविष्य चाहिए नहीं।

उसके वर्त्तमान और भविष्य, दोनों मीठे हो जायेंगे।

भ्रांत कौन, और किसके लिए?

अंतर्विकल्पशून्यस्य बहिः स्वच्छन्दचारिणः। भ्रान्तस्येव दशास्तास्तास्-तादृशा एव जानते॥ – अष्टावक्र गीता (१४- ४) अनुवाद : भीतर से निर्विकल्प और बाहर से स्वच्छंद आवरण वाले, प्रायः भ्रांत

मेरा असली स्वभाव क्या है?

कुत्रापि खेद: कायस्य जिह्वा कुत्रापि खेद्यते।  मन: कुत्रापि तत्त्यक्त्वा पुरुषार्थे स्थित: सुखम्।।  ~ अष्टावक्र गीता(१३.२)  अनुवाद: शारीरिक दुःख भी कहाँ है, वाणी के दुःख भी

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