भ्रांत कौन, और किसके लिए?

अंतर्विकल्पशून्यस्य बहिः स्वच्छन्दचारिणः। भ्रान्तस्येव दशास्तास्तास्-तादृशा एव जानते॥ – अष्टावक्र गीता (१४- ४) अनुवाद : भीतर से निर्विकल्प और बाहर से स्वच्छंद आवरण वाले, प्रायः भ्रांत

मेरा असली स्वभाव क्या है?

कुत्रापि खेद: कायस्य जिह्वा कुत्रापि खेद्यते।  मन: कुत्रापि तत्त्यक्त्वा पुरुषार्थे स्थित: सुखम्।।  ~ अष्टावक्र गीता(१३.२)  अनुवाद: शारीरिक दुःख भी कहाँ है, वाणी के दुःख भी

संवेदनशीलता, भावुकता नहीं

संवेदना का अर्थ ये नहीं है कि तुमने किसी
को रोते देखा और तुम रोने लग गए। संवेदना अर्थ है कि तुमने किसी को रोते
देखा और तुम जान गए कि उसका जो कष्ट है, वो कितना नकली है। और जब तुम जान
जाते हो कि कष्ट नकली है, तभी तुम उसके कष्ट का उपचार भी कर सकते हो।

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